मीराबाई चानू के कोच विजय शर्मा ने कहा: गांव से रहा दूर... लगाव नहीं हुआ कम, जम्मू में खोलेंगे अकादमी
मीराबाई चानू के कोच विजय शर्मा ने कहा 1970 में मेरा जन्म हुआ और बचपन अखनूर के सोहल टांडा गांव में बीता। इसके बाद भी गांव से लगाव और जुड़ाव हमेशा रहा। उन्होंने कहा कि ओलंपिक पदक जीतने के बाद रिश्तेदारों ने गांव आने का न्योता दिया है। अगस्त के पहले सप्ताह में गांव आने का प्लान है।
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जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी और आईबी-एलओसी के पास रहने वाली लड़कियां भी मीराबाई चानू जितनी मजबूत हैं। उन्हें बेहतर सुविधा और उचित मार्गदर्शन मिले तो वह देश के लिए मेडल जीत सकती हैं। यह बात ओलंपिक विजेता चानू के कोच और अखनूर निवासी विजय शर्मा ने कही।
द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित विजय शर्मा का अपने गांव सोहल टांडा से हमेशा जुड़ाव रहा है। ओलंपिक में भाग लेने से पहले वह अपने गांव पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि भविष्य में जम्मू में भारोत्तोलन (वेटलिफ्टिंग) को बढ़ावा देने के लिए ट्रेनिंग दी जाएगी। इसके लिए उनकी बेहतरीन अकादमी खोलने की तमन्ना है। जम्मू समेत पूरे प्रदेश के पहाड़ी और सीमावर्ती क्षेत्र की लड़कियां भी ओलंपिक में भाग लेने वाली सभी खिलाड़ियों जितनी ही सक्षम हैं। उन्हें बस बेहतरीन करने के लिए प्रेरित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर वेटलिफ्टिंग एसोसिएशन लगातार अच्छा काम कर रही है।
गांव से रहा दूर... लगाव नहीं हुआ कम
शर्मा ने बताया कि अखनूर के सोहल टांडा गांव से उनका लगाव कभी कम नहीं हुआ। पूरा परिवार के साथ साल में एक बार गांव जरूर आता हूं। बच्चों को गांव और अपने जड़ों से जोड़े रखना जरूरी है। उन्होंने बताया कि पिता 16 वर्ष की आयु में सेना में भर्ती हो गए थे। सेवानिवृत्त होने के बाद काम की तलाश में 1968-69 में मोदीनगर चले आए।
रियो ओलंपिक की नाकामी ने निराश नहीं, प्रेरित किया
मीराबाई चानू के साथ 2014 से काम कर रहा हूं। 2016 में रियो ओलंपिक की जब हम मेडल नहीं जीत पाए तो उस नाकामी ने हमें निराश करने के बजाय प्रेरित किया। 2016 से सबक लेते हुए हमने हर कदम को ओलंपिक पर केंद्रित रखा। 2016 जिस पैट्रन में हमारी ट्रेनिंग थी उसमें बदलाव किया और सकारात्मक सोच के अपने तैयारी को लगातार जारी रखा। इसके परिणाम हमें दिखने भी लगे। 2017 में मीरा विश्व चैंपियन बनी। 2018 में राष्ट्रमंडल खेलों में गोल्ड जीता। 2019 में फिर विश्व चैंपियनशिप में मेडल जीता। यानी की 2016 के बाद हमारा हर कदम ओलंपिक की तैयारी पर ही केंद्रित था।
इन पांच सालों की यात्रा में हमने अच्छे और बुरे दिन देखे, लेकिन हमने अपने लक्ष्यों को कभी धुंधला नहीं पड़ने दिया। इसमें सरकार का सहयोग काफी अच्छा मिला। अच्छी ट्रेनिंग के लिए दो बार यूएस भेजा, जिससे हमारी तैयारी और पुख्ता हुई, लक्ष्य स्वर्ण पदक का था, लेकिन हम सिल्वर जीतने में कामयाब हुए।
खेलों में बेहतर करने के लिए नशे से रहें दूर
उन्होंने स्थानीय युवाओं से कहा कि आगे बढ़ने और खेलों में बेहतर करने के लिए नशे से दूर रहना होगा। अपनी ट्रेनिंग को अनुशासन के साथ नियमित जारी रखना होगा। आपको यह सोचकर अपना ट्रेनिंग करनी होगी कि अगर मीराबाई चानू मेडल ला सकती है तो हम भी जीत सकते हैं।