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लंबरदार अपनी मृत्यु तक पद पर नहीं रह सकते : हाई कोर्ट
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जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक संशोधन को बरकरार रखा है, जिसमें एक उप-नियम को हटा दिया गया है। इसमें यह प्रावधान था कि चुनाव के अलावा किसी अन्य माध्यम से नियुक्त किए गए लंबरदार अपनी मृत्यु तक, बर्खास्त होने तक, या आम चुनाव होने तक पद पर बने रह सकते हैं।
रजनीश ओसवाल की पीठ ने कई याचिकाओं को खारिज करते हुए, इसे लंबरदारों की नियुक्ति, चुनाव और नामांकन को सुव्यवस्थित करने की दिशा में सरकार की ओर से एक स्वागत योग्य कदम बताया।
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि उन्हें जम्मू-कश्मीर लंबरदारी अधिनियम के प्रावधानों के तहत चुनाव के अलावा किसी अन्य तरीके से लंबरदार नियुक्त किया गया था। उन्होंने कोर्ट से उन्हें लंबरदार के अपने-अपने पदों से न हटाने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
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पीठ ने कहा, यह उल्लेखनीय है कि सरकार द्वारा याचिकाकर्ताओं को हटाने के संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया गया था और न ही लम्बरदारों के पद के लिए कोई चुनाव अधिसूचित किया गया था, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने अपने निष्कासन की आशंका के चलते चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने की आशंका में ये याचिकाएं दायर की हैं, जो कि क़ानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। और याचिकाओं को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा, प्रतिवादियों (प्राधिकारियों) को नियमों के अनुसार चुनाव कराने की स्वतंत्रता है। साथ ही, उम्मीद है कि प्रतिवादी लम्बरदारों की अस्थायी नियुक्तियां करते समय नियमों के निर्देशों का कड़ाई से पालन करेंगे।
अदालत ने यह भी फैसला सुनाया कि आकस्मिक रिक्ति को नियमों के नियम 17 के अनुसार छह महीने से अधिक की अवधि के लिए नामांकन द्वारा भरा जा सकता है। अदालत ने कहा, इस असाधारण शक्ति का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब नियमों के नियम 11 के अनुसार अनिर्वाचित लम्बरदार की नियुक्ति की जाती है।
न्यायालय ने रेखांकित किया कि 1980 के नियम 14(4) के संशोधित नियम के तहत, लंबरदार के रिक्त पद पर नियुक्ति 6 महीने से अधिक अवधि के लिए नहीं की जा सकती। “यह ध्यान देने योग्य है कि नियम 8 या 10 के तहत निलंबित लंबरदार के स्थान पर तहसीलदार द्वारा किसी स्थानापन्न की नियुक्ति की जा सकती है।”
इसके अलावा, न्यायालय ने कहा कि यदि कोई लंबरदार, तहसीलदार की अनुमति से, बीमारी या किसी अन्य कारण से 6 महीने से अधिक अवधि के लिए अनुपस्थित रहता है या इन नियमों के तहत उसे सौंपे गए कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है, तो उसके स्थान पर 6 महीने से अधिक अवधि के लिए किसी स्थानापन्न की नियुक्ति की जा सकती है। “हालाँकि, असाधारण मामलों में, जिला कलेक्टर के पूर्व अनुमोदन से 6 महीने की अवधि बढ़ाई जा सकती है।”
इससे पहले, याचिकाओं पर अपनी आपत्तियों में, सरकार ने प्रस्तुत किया था कि नियमों में अस्पष्टता को दूर करने के लिए संशोधन किया गया है। सरकार ने कहा कि 2017 के एसआरओ 412 के अनुसार, लंबरदार का कार्यकाल 5 वर्ष या 60 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पहले हो, निर्धारित किया गया है।
सरकार ने कहा, मौजूदा परिस्थितियों के कारण, लंबरदार के पद के लिए चुनाव नहीं हो सके और कुछ क्षेत्रों में मौजूदा लंबरदार की मृत्यु/इस्तीफा आदि के कारण, चुनाव होने तक लंबरदार के पदों के लिए कुछ नामांकन/नियुक्तियां की गई हैं। सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता यह दावा नहीं कर सकते कि वे अपनी मृत्यु तक लंबरदार के पद पर बने रहने के हकदार हैं, जब तक कि उन्हें क्षेत्र के लोगों द्वारा निर्वाचित नहीं किया गया हो।
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रजनीश ओसवाल की पीठ ने कई याचिकाओं को खारिज करते हुए, इसे लंबरदारों की नियुक्ति, चुनाव और नामांकन को सुव्यवस्थित करने की दिशा में सरकार की ओर से एक स्वागत योग्य कदम बताया।
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याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि उन्हें जम्मू-कश्मीर लंबरदारी अधिनियम के प्रावधानों के तहत चुनाव के अलावा किसी अन्य तरीके से लंबरदार नियुक्त किया गया था। उन्होंने कोर्ट से उन्हें लंबरदार के अपने-अपने पदों से न हटाने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
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पीठ ने कहा, यह उल्लेखनीय है कि सरकार द्वारा याचिकाकर्ताओं को हटाने के संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया गया था और न ही लम्बरदारों के पद के लिए कोई चुनाव अधिसूचित किया गया था, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने अपने निष्कासन की आशंका के चलते चुनाव प्रक्रिया में बाधा डालने की आशंका में ये याचिकाएं दायर की हैं, जो कि क़ानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है। और याचिकाओं को खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा, प्रतिवादियों (प्राधिकारियों) को नियमों के अनुसार चुनाव कराने की स्वतंत्रता है। साथ ही, उम्मीद है कि प्रतिवादी लम्बरदारों की अस्थायी नियुक्तियां करते समय नियमों के निर्देशों का कड़ाई से पालन करेंगे।
अदालत ने यह भी फैसला सुनाया कि आकस्मिक रिक्ति को नियमों के नियम 17 के अनुसार छह महीने से अधिक की अवधि के लिए नामांकन द्वारा भरा जा सकता है। अदालत ने कहा, इस असाधारण शक्ति का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है जब नियमों के नियम 11 के अनुसार अनिर्वाचित लम्बरदार की नियुक्ति की जाती है।
न्यायालय ने रेखांकित किया कि 1980 के नियम 14(4) के संशोधित नियम के तहत, लंबरदार के रिक्त पद पर नियुक्ति 6 महीने से अधिक अवधि के लिए नहीं की जा सकती। “यह ध्यान देने योग्य है कि नियम 8 या 10 के तहत निलंबित लंबरदार के स्थान पर तहसीलदार द्वारा किसी स्थानापन्न की नियुक्ति की जा सकती है।”
इसके अलावा, न्यायालय ने कहा कि यदि कोई लंबरदार, तहसीलदार की अनुमति से, बीमारी या किसी अन्य कारण से 6 महीने से अधिक अवधि के लिए अनुपस्थित रहता है या इन नियमों के तहत उसे सौंपे गए कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है, तो उसके स्थान पर 6 महीने से अधिक अवधि के लिए किसी स्थानापन्न की नियुक्ति की जा सकती है। “हालाँकि, असाधारण मामलों में, जिला कलेक्टर के पूर्व अनुमोदन से 6 महीने की अवधि बढ़ाई जा सकती है।”
इससे पहले, याचिकाओं पर अपनी आपत्तियों में, सरकार ने प्रस्तुत किया था कि नियमों में अस्पष्टता को दूर करने के लिए संशोधन किया गया है। सरकार ने कहा कि 2017 के एसआरओ 412 के अनुसार, लंबरदार का कार्यकाल 5 वर्ष या 60 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पहले हो, निर्धारित किया गया है।
सरकार ने कहा, मौजूदा परिस्थितियों के कारण, लंबरदार के पद के लिए चुनाव नहीं हो सके और कुछ क्षेत्रों में मौजूदा लंबरदार की मृत्यु/इस्तीफा आदि के कारण, चुनाव होने तक लंबरदार के पदों के लिए कुछ नामांकन/नियुक्तियां की गई हैं। सरकार ने कहा कि याचिकाकर्ता यह दावा नहीं कर सकते कि वे अपनी मृत्यु तक लंबरदार के पद पर बने रहने के हकदार हैं, जब तक कि उन्हें क्षेत्र के लोगों द्वारा निर्वाचित नहीं किया गया हो।