Ladakh Election: बौद्ध नेता चेरिंग बोले- चुनाव पर मतभेद, लेकिन छठी अनुसूची की मांग के लिए लद्दाखी एकजुट
बौद्ध नेता ने कहा कि लद्दाखियों की आकांक्षाएं पूरी होंगी तो देश की रक्षा मजबूत होगी। लद्दाख में युद्ध के समय नागरिक हमेशा सेना के साथ खड़े रहते हैं। इसलिए लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना हमारे देश के लिए महत्वपूर्ण है।
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लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन (एलबीए) के अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लाक्रुक ने कहा कि भले ही लद्दाख में लोकसभा चुनाव के लिए लोगों के बीच अलग-अलग मत नजर आए, लेकिन छठी अनुसूची की मांग के लिए सभी लद्दाखवासी एकजुट हैं।
उन्होंने कहा कि संविधान की छठी अनुसूची के तहत लद्दा को राज्य के दर्जे और सुरक्षा उपायों की मांगों पर चुनाव के कारण एकता प्रभावित नहीं होगी। लद्दाख में 20 मई को पांचवें चरण में चुनाव होने हैं।
यहां त्रिकोणीय मुकाबला होने जा रहा है। लेह से भाजपा और कांग्रेस ने उम्मीदवार उतारे हैं। वहीं, कारगिल से स्वतंत्र उम्मीदवार चुनावी मैदान में है। भाजपा के ताशी ग्यालसन, कांग्रेस के टी नामग्याल और कारगिल से निर्दलीय हाजी हनीफा जान चुनाव लड़ रहे हैं। खास बात यह है कि कारगिल में हनीफा को नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां), कांग्रेस और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) के समर्थकों का भी साथ मिल रहा है
लाक्रुक ने लद्दाख की भूमि और संस्कृति की रक्षा के लिए सुरक्षा उपायों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने स्थानीय जनजातियों द्वारा चराई के लिए इस्तेमाल की जाने वाली चारागाह भूमि पर चीन द्वारा कब्जा किए जाने का आरोप लगाया और इस पर चिंता जताई।
लद्दाख के एक प्रमुख सामाजिक और धार्मिक संगठन एलबीए की छठी अनुसूची की आवश्यकता पर आम सहमति विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संविधान की छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के प्रावधानों से संबंधित है।
1933 में स्थापित, एलबीए ने आजादी के तुरंत बाद लद्दाख को एक अलग राज्य बनाने की मांग उठाई थी। हालांकि, उस समय यह जम्मू-कश्मीर में शामिल था। लेकिन अलग पहचान की मांग जारी रही।
लाक्रुक ने कहा, 'अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद शुरुआत में जश्न मनाया गया। लेकिन फिर हमें एहसास हुआ कि यह हमारे लिए अच्छा नहीं है।'
उन्होंने कहा कि विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और अन्य संगठनों ने लद्दाख के मुद्दों को लेकर एकजुट होने शुरू हुए। नतीजतन लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) एक साथ आए। उनके प्रतिनिधि चार प्रमुख मांगों - छठी अनुसूची, राज्य का दर्जा, एक अलग लोक सेवा आयोग और लेह और कारगिल में लोकसभा सीटों के लिए केंद्र सरकार के लिए संवाद कर रहे थे।
उन्होंने कहा, 'गृह मंत्रालय के साथ बातचीत के दौरान, यह समझ आया कि चुनाव से पहले समय निकाला जा रहे हैं। लोक सेवा आयोग पर केवल कुछ आश्वासन दिया गया।'
उन्होंने दावा किया, 'गृह मंत्रालय ने अनुच्छेद 371 का कोई प्रस्ताव नहीं दिया। यह एक अटकल थी। उन्होंने हमें बताया कि हमारी मौजूदा परिषदों को मजबूत किया जाएगा और वे एक सलाहकार परिषद बनाएंगे। हमारे पास पहले से ही एलएएचडीसी अधिनियम (लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद अधिनियम, 1997) है ) लेकिन अब परिषद की शक्तियां भी कम कर दी गई हैं।'
लाक्रुक ने कहा, 'लद्दाख में परंपरा है कि मतदान क्षेत्रीय आधार पर होता है। इसलिए स्वतंत्र उम्मीदवार को कुछ बढ़त मिलने की संभावना है।'
उन्होंने कहा कि एलबीए छठी अनुसूची की मांग पर लोगों को शिक्षित करने के लिए हर गांव और बस्ती में गया। केंद्र सरकार के साथ बातचीत विफल होने पर उन्हें प्रदर्शन का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
उन्होंने कहा कि अगर लद्दाखियों की आकांक्षाएं पूरी होंगी तो देश की रक्षा मजबूत होगी। लद्दाख में युद्ध के समय नागरिक हमेशा सेना के साथ खड़े रहते हैं। इसलिए लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना हमारे देश के लिए महत्वपूर्ण है।