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घाटी से मुस्लिम भी आने लगे कश्मीर फाइल्स के समर्थन में
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जम्मू। घाटी में कश्मीरी हिंदुओं के कत्लेआम और विस्थापन पर बनी चर्चित फिल्म कश्मीर फाइल्स को लेकर जहां सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है, वहीं कश्मीरी मुस्लिम भी इसके समर्थन में सामने आने लगे हैं। कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार के चश्मदीद रहे कश्मीरी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता जावेद बेग ने अपने ट्विटर हैंडल पर कश्मीरी हिंदु महिला गिरिजा टिक्कू की विचलित कर देने वाली तस्वीर साझा कर लिखा-मैं एक कश्मीरी मुस्लिम हूं। हमारी पंडित बहन गिरिजा टिक्कू को कश्मीरी मुस्लिम परिवारों से संबंधित आतंकियों ने जिंदा काट डाला था। आतंकियों के हाथों में पाकिस्तान की दी हुईं बंदूकें थीं। यह सब आजादी के नाम पर हुआ। यह कोई दुष्प्रचार नहीं, बल्कि हकीकत है। मैं हाथ जोड़कर पंडित बिरादरी से उस अत्याचार के लिए माफी मांगता हूं। बेग के ट्वीट पर कई प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता जावेद बेग ने बातचीत में कहा कि यह हकीकत है, जिसे छुपाया जा सकता है लेकिन झुठलाया नहीं जा सकता। बेग के अनुसार वह बडगाम के बीरवाह से हैं। वर्ष 1997 में आधी रात को पंडितों के नरसंहार के वह खुद चश्मदीद रहे हैं। बेग ने कहा कि नरसंहार के शहीद हिंदुओं में एक कश्मीरी पंडित हेडमास्टर भी थे, जिन्होंने उस इलाके के लोगों को पढ़ाया था। कश्मीरी हिंदुओं के साथ जो हुआ, उस पर कश्मीरी मुस्लिम समुदाय की चुप्पी डर की वजह से थी। मजहब कोई भी हो, कश्मीरी एक ही नस्ल के हैं। कश्मीर के बहुसंख्यक भी कश्मीरी पंडितों को कत्लोगारत से बचाने में नाकाम रहे, यह हमें स्वीकार करना होगा। माफी मांगकर कश्मीरी तहजीब के अटूट अंग पंडितों को बाइज्जत वापस घाटी में बुलाना चाहिए। इसके लिए बाकायदा मस्जिदों से एलान होने चाहिएं।
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सामाजिक कार्यकर्ता जावेद बेग ने बातचीत में कहा कि यह हकीकत है, जिसे छुपाया जा सकता है लेकिन झुठलाया नहीं जा सकता। बेग के अनुसार वह बडगाम के बीरवाह से हैं। वर्ष 1997 में आधी रात को पंडितों के नरसंहार के वह खुद चश्मदीद रहे हैं। बेग ने कहा कि नरसंहार के शहीद हिंदुओं में एक कश्मीरी पंडित हेडमास्टर भी थे, जिन्होंने उस इलाके के लोगों को पढ़ाया था। कश्मीरी हिंदुओं के साथ जो हुआ, उस पर कश्मीरी मुस्लिम समुदाय की चुप्पी डर की वजह से थी। मजहब कोई भी हो, कश्मीरी एक ही नस्ल के हैं। कश्मीर के बहुसंख्यक भी कश्मीरी पंडितों को कत्लोगारत से बचाने में नाकाम रहे, यह हमें स्वीकार करना होगा। माफी मांगकर कश्मीरी तहजीब के अटूट अंग पंडितों को बाइज्जत वापस घाटी में बुलाना चाहिए। इसके लिए बाकायदा मस्जिदों से एलान होने चाहिएं।
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