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Jammu : बलिदान दिवस पर कश्मीरी पंडितों ने लिया घाटी लौटने का संकल्प, प्रधानमंत्री मोदी को चिट्ठी लिख बताया हाल

Fri, 15 Sep 2023 04:38 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 15 Sep 2023 04:38 AM IST
सार

1990 से कश्मीरी पंडित 14 सितंबर के दिन को बलिदान दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं।

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Kashmiri Pandits resolved to return to the valley on Sacrifice Day
बरनाई में राष्ट्रीय सम्मेलन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कश्मीर घाटी में लौटने के संकल्प के साथ वीरवार को कश्मीरी पंडित समुदाय ने बलिदान दिवस मनाया। 1990 से कश्मीरी पंडित 14 सितंबर के दिन को बलिदान दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं।

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समुदाय के बलिदानियों को याद करने के लिए वीरवार को पनुन कश्मीर ने कांगरा फोर्ट बरनाई में राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। इसका विषय जम्मू-कश्मीर के हिंदुओं के साथ विश्वासघात की अंतर्धारा था। इस दौरान प्रधानमंत्री के नाम एक पत्र भी भेजा गया। इस पत्र में अनुच्छेद 370 हटने के बाद भी कश्मीरी पंडितों के नरसंहार जारी रहने की बात के साथ अन्य मामलों का उल्लेख किया है। राष्ट्रीय सम्मेलन में मीनाक्षी शरण, संजय दीक्षित, शशि शेखर तोषकानी और आरती टिक्कू सिंह प्रमुख वक्ता रहे।
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पनुन कश्मीर के अध्यक्ष डॉ. अजय चिरांगू ने कहा कि आतंकवाद का निशाना बने लोगों को याद करने का दिन है। इसमें पूरे वर्ष के लिए कार्यक्रम तय करते हैं। इसके आधार पर ही पनुन कश्मीर अपने संघर्ष को जारी रखता है। वक्ता संजय दीक्षित ने कहा कि 14 सितंबर का दिन जम्मू-कश्मीर के इतिहास में दुखद घटना है। इस दिन को याद रखना बहुत जरूरी है। इसके जरिये युवा पीढ़ी को यह जानना जरूरी है कि उनके पूर्वजों के साथ किस तरह का अत्याचार हुआ है।
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आरती टिक्कू सिंह ने कहा कि वह बलिदान व्यर्थ नहीं गया है। इसकी सफलता का सुबूत अनुच्छेद 370 और 35 हटना है। आज जम्मू-कश्मीर पूरे देश के लिए खुला है। अंकुर शर्मा ने कहा कि आज भी कश्मीरी हिंदू समाज की स्थिति नहीं बदली है। कार्यक्रम में शहीदों की शहादत के सम्मान में दो मिनट का मौन रखा गया।


पीएम को लिखे पत्र के मुख्य अंश
नरसंहार से इनकार करने से नरसंहार का दोहराव और प्रसार में मदद मिलती है। इसलिए जम्मू-कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार को मान्यता देना न केवल कश्मीर में हिंदुओं के अस्तित्व के लिए बल्कि शेष भारत में नरसंहार के विस्तार पर रोक लगाने के लिए भी अनिवार्य आवश्यकता है। इस बात की अत्यंत आवश्यकता है कि भारत सरकार नरसंहार के अपराध की रोकथाम और सजा पर एक कानून बनाए। जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन अभी अधूरा है। कश्मीर के हिंदुओं के पुनर्वास के लिए जम्मू को कश्मीर से अलग कर और कश्मीर को विभाजित कर झेलम नदी के पूर्व और उत्तर में एक केंद्र शासित प्रदेश बनाने की आवश्यकता है।

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