कारगिल गाथा: बमबारी के बीच हाथ से निकाले पांच हजार माइन
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सुरक्षित मोर्चों पर बंकरों में बैठे दुशमन से लोहा लेने में भारतीय सेना का पराक्रम विरला था। लेकिन युद्ध के मैदान पर भारतीय सेना के एक-एक कदम को सुरक्षा देने वाले इंजीनियरिंग कार्प्स के सैपर्स की भूमिका भी अहम रही। दुशमन ने जगह-जगह माइन बिछा रखे थे।
ऐसे में भारतीय सेना के आगे बढ़ते ही कब विस्फोट हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता था। युद्ध स्थल चूंकि दुरुह था ऐसे में सैपर्स की दिलेर टीम ने माइन बरामद कर उन्हें निकालने का सारा आपरेशन हाथों से अंजाम दिया। ऊपर से दुश्मन बमबारी करता और नीचे जान की परवाह किए बिना सैपर्स की टीम माइन निकालने में जुटी रहती।
कारगिल युद्ध के दौरान सैपर्स की ही करामात थी कि बमबारी के बीच 5 हजार माइन हाथों से ही निकाल लिए गए। भारतीय अमला आगे बढ़ सके इसके लिए 8 किलोमीटर लंबी सड़क और 250 किलोमीटर लंबा खच्चर मार्ग तैयार कर दिया। उच्च पेशेवर कौशल से लैस सैपर्स ने दिलेरी के साथ साथ एडवांस प्लानिंग और व्यवस्थाओं को सुनिश्चित करने में अलग की नजीर पेश की।
यही वजह है कि भारतीय सेना ने आपरेशन विजय के दौरान चप्पे-चप्पे पर मौजूद खतरे की चुनौती को पार किया। वहीं ऊंचाई वाले युद्ध स्थल पर आर्टिलरी का आपरेशन भी दुश्मन के लिए चौकाने वाला साबित हुआ। दुर्गम तोलोलिंग हो या फिर टाइगर हिल, आर्टिलरी की सही पोजीशनिंग और सटीक के निशाने ने दुश्मन को भौचक्का कर दिया। आर्टिलरी की तीन रेजिमेंटों को यूनिट साइटेशन का सम्मान दिया गया।
सिर्फ चने खाकर लड़ा था युद्ध
कारगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना के दांत खट्टे करने वाले जांबाजों का दिल आज भी देश के लिए ही धड़क रहा है। कारगिल युद्ध का हिस्सा रहे पूर्व सैनिकों का मानना है कि यदि आज भी उन्हें ऐसे किसी मौके पर मोर्चा संभालने का जिम्मा मिले, तो वे पूरे जोश के साथ दुश्मन के छक्के छुड़ाने को तैयार हैं। 15 फील्ड रेजिमेंट से सेवानिवृत्त हुए जवान जैमल राम बताते हैं कि उन्हें कारगिल युद्ध के मोर्चे पर रिपोर्ट करने का आदेश मिला था।
155 फील्ड रेजिमेंट, 555 फील्ड रेजिमेंट, लाइट मोर्टार और हैवी मोर्टार रेजिमेंट के जवान तैयार हो गए। 6 मई 1999 को जब भारतीय सेना की एक टुकड़ी पेट्रोलिंग के लिए गई थी, तो पाक सेना व घुसपैठियों ने उन पर गोलीबारी शुरू कर दी। वहीं सात मई को पाक ने आर्टिलरी फायर शुरू कर दिया था। 10 व 14 मई को घुसपैठियों व सेना के जवानों के मध्य संघर्ष तेज हुआ, जिसके बाद उन्हें फील्ड रेजिमेंट को मदद पहुंचाने का जिम्मा मिला। तब 13 जैकलाई रेजिमेंट को दिल्ली से बुलाया गया था।
21 सिख लाई, 8 सिखलाई, 12 जाट रेजिमेंट,18 ग्रेनेडियर, नागालैंड आर्मी और गोरखा रेजिमेंट, राजपुताना रेजिमेंट, राज राइफल के जवान कारगिल की चोटियों पर तैनात थे। उधर 18 ग्रेनेडियर के सेवानिवृत्त जवान ओंकार चौधरी ने बताया कि उन्हें तोलोलिंग पहाड़ी को दुश्मन से मुक्त करवाने का आर्डर मिला था। खाने के लिए सिर्फ चने थे और चुनौती तोलोलिंग पर कब्जा करने की थी। इसी दौरान उनके एक अधिकारी टूआईसी विश्वनाथन शहीद हो गए। बाद में उन्हें टाइगर हिल पर कब्जा करने को भेजा गया।
पाक सेना के साथ कड़े संघर्ष में पलटन के सात जवान शहीद हो गए। उनकी पलटन ने भी दुश्मनों को धकेलने की अहम भूमिका निभाई थी। उनकी पलटन के ही योगेंद्र सिंह यादव को परमवीर चक्र दिया गया था। सेवानिवृत्त जवानों के अनुसार सबसे अधिक 13 जैकलाई रेजिमेंट के जवानों ने शहादत पाई थी। 21 सिखलाई, आठ सिखलाई, नागालैंड आर्मी, 18ग्रेनेडियर का अधिक नुकसान हुआ था।