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जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट: अस्पताल सूची में नहीं, इसलिए प्रतिपूर्ति दावा खारिज नहीं कर सकते, मुआवजा देने के आदेश

Fri, 28 Apr 2023 02:19 AM IST
विमल शर्मा जेएनएफ, जम्मू
जेएनएफ, जम्मू Published by: विमल शर्मा Updated Fri, 28 Apr 2023 02:19 AM IST
सार

न्यायाधीश ने कहा कि यह कोई तर्क नहीं है कि क्लेम के लिए अस्पताल का नाम सूची में शामिल हो।  वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता प्रासंगिक समय पर एक अस्थायी कर्मचारी थी और उसका पति उस पर निर्भर था।

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JK HC: Hospital not in list hence reimbursement claim cannot be rejected
highcourt srinagar - फोटो : फाइल

विस्तार

जम्मू-कश्मीर व लद्दाख न्यायालाय के न्यायाधीश रजनीश ओसवाल ने कहा कि प्रतिपूर्ति के दावे को इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि जिस अस्पताल में इलाज हुआ वह स्वीकृत अस्पतालों में शामिल नहीं है। 

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इस दलील के साथ उन्होंने प्रतिवादियों को नियमों के अनुसार चिकित्सा खर्च के लिए याचिकाकर्ता के दावे पर विचार करने के लिए कहा। इसके साथ ही दो माह के भीतर इस पर अमल करने के आदेश भी दिए हैं। यह मामला एक अस्थायी महिला कर्मी का है।
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वर्ष 2010 में महिला अपने पति के साथ नागपुर की निजी यात्रा पर प्रदेश से बाहर गई थी। जहां उसका पति गंभीर रूप से बीमार हो गया 5 अक्तूबर.2009 को नागपुर के कलापतरु अस्पताल में उन्हें भर्ती कराया गया। बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
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उनके उपचार पर 25 लाख रुपये का खर्च आया। महिला ने इस रकम का दावा किया। हालांकि वह सिर्फ 12 लाख रुपये के ही बिल पेश कर सकी। उसका कहना था कि कुछ खर्चों के बिल नहीं हैं। दावे के मुकाबले उसे सिर्फ डेढ़ लाख की रकम दी गई। कहा गया कि जिस अस्पताल में उसने पति का उपचार कराया।

वह क्लेम के लिए स्वीकृत अस्पतालों की सूची में शामिल नहीं है। इस पर न्यायाधीश ने कहा कि यह कोई तर्क नहीं है कि क्लेम के लिए अस्पताल का नाम सूची में शामिल हो।  वर्तमान मामले में याचिकाकर्ता प्रासंगिक समय पर एक अस्थायी कर्मचारी थी और उसका पति उस पर निर्भर था।

जिसे आपातकालीन चिकित्सा स्थिति के कारण उस पर भारी खर्च किया और पति का इलाज कराया। यह याचिकाकर्ता  की स्थिति को  प्रदर्शित करता है। अदालत ने कहा कि प्रतिपूर्ति दावे को स्वीकृत करने वाले अधिकारियों पास इन नियमों में राहत देने का अधिकार था।


ताकि राज्य के बाहर इलाज के लिए याचिकाकर्ता के चिकित्सा दावे की प्रतिपूर्ति को स्वीकार कर सकें।  अदालत ने कहा, ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता के दावे पर विचार करते समय मानवीय दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक था।  

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