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पीओजेके विस्थापितों की दास्तां सुन नम हो गईं आंखें
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जम्मू। श्रद्धांजलि समारोह में पीओजेके विस्थापितों की दास्तां सुनकर लोगों की आंखें नम हो गईं। जम्मू के बख्शी नगर में रह रहे पीओजेके विस्थापित डॉ. जसवंत सिंह ने कहा, उनकी जन्म भूमि रावला कोट है, जो पुंछ शहर से 90 किलोमीटर दूर है। वह चार वर्ष के थे तो रावला कोट में हालात खराब हो गए थे। उनके पिता सैनिक थे। 1947 में 700 लोगों का काफिला लेकर पुंछ के लिए रवाना हुए थे। कठिन पहाड़ी मार्ग से पुंछ पहुंचने में कई दिन लगे, रास्ते में कबाइलियों ने कई लोगों की हत्या कर दी। उन्होंने सरकार से मांग की कि सरकार पीओजेके को पाकिस्तान के कब्जे से मुक्त करवाए।
दादी की हत्या नहीं भूलेंगे कभी
ज्यौड़िया में रह रहे विस्थापित मास्टर स्वर्ण सिंह ने कहा कि उनके पिता मीरपुर जिला के भिंबर तहसील के खोखरा गांव से विस्थापित होकर जम्मू में आकर बसे थे। उन्होंने कहा कि उन्होंने 1947 का दौर नहीं देखा। उनका जन्म बाद में हुआ है। उनके पिता का नाम झंडू राम था। वे सात भाई थे, सभी सैनिक थे। उनकी दादी गोगली बटाला गांव में अपने रिश्तेदारों के घर में गई थी। रात को ही बटाला की पाकिस्तान ने घेराबंदी कर उसे कब्जे में ले लिया और दादी समेत रिश्तेदारों की हत्या कर दी। उन्होंने मांग की कि प्रति परिवार 25-25 लाख बकाया राहत राशि दी जाए।
1947 की काली रात नहीं भुलती
जम्मू में रह रहे 86 वर्षीय शामलाल ने कहा कि 1947 की वह काली आज भी नहीं भूलती। उनकी तीसरी पीढ़ी उन घटनाओं को सुनकर चिंतित हो जाती है। उन्होंने कहा कि सरकार पाक अधिकृत मीर पुर को आजाद कराए। वीरता ने कहा कि दादा-दादी से मुजफ्फराबाद की कहानियां सुनीं। 1947 में हुए कत्लेआम से बचने के लिए कई लोगों ने नदी नालों में कूदकर जान दे दी। उन्होंने कहा कि सरकार पीओेजेके को आजाद कराने के लिए कोई ठोस कदम उठाए।
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दादी की हत्या नहीं भूलेंगे कभी
ज्यौड़िया में रह रहे विस्थापित मास्टर स्वर्ण सिंह ने कहा कि उनके पिता मीरपुर जिला के भिंबर तहसील के खोखरा गांव से विस्थापित होकर जम्मू में आकर बसे थे। उन्होंने कहा कि उन्होंने 1947 का दौर नहीं देखा। उनका जन्म बाद में हुआ है। उनके पिता का नाम झंडू राम था। वे सात भाई थे, सभी सैनिक थे। उनकी दादी गोगली बटाला गांव में अपने रिश्तेदारों के घर में गई थी। रात को ही बटाला की पाकिस्तान ने घेराबंदी कर उसे कब्जे में ले लिया और दादी समेत रिश्तेदारों की हत्या कर दी। उन्होंने मांग की कि प्रति परिवार 25-25 लाख बकाया राहत राशि दी जाए।
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1947 की काली रात नहीं भुलती
जम्मू में रह रहे 86 वर्षीय शामलाल ने कहा कि 1947 की वह काली आज भी नहीं भूलती। उनकी तीसरी पीढ़ी उन घटनाओं को सुनकर चिंतित हो जाती है। उन्होंने कहा कि सरकार पाक अधिकृत मीर पुर को आजाद कराए। वीरता ने कहा कि दादा-दादी से मुजफ्फराबाद की कहानियां सुनीं। 1947 में हुए कत्लेआम से बचने के लिए कई लोगों ने नदी नालों में कूदकर जान दे दी। उन्होंने कहा कि सरकार पीओेजेके को आजाद कराने के लिए कोई ठोस कदम उठाए।
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