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Jammu: सेब से मीठे वादे करते रहे नेता... दशकों से न बड़ी मंडी बनी, न ग्रेडिंग के लिए सुविधा; बड़ा है ये मुद्दा
Mon, 09 Sep 2024 02:25 PM IST
शाहरुख खान
सतीश वालिया, अमर उजाला, जम्मू
सतीश वालिया, अमर उजाला, जम्मू
Published by: शाहरुख खान
Updated Mon, 09 Sep 2024 02:25 PM IST
सार
जम्मू-कश्मीर में नेता सेब से मीठे वादे करते रहे। दशकों से न बड़ी मंडी बनी, न ग्रेडिंग के लिए सुविधा मिली। नेताओं के वादे पूरे नहीं हुए। कश्मीरी अखरोट बाजार प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहा है। कम रेट में सेब बिक रहा है।
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Jammu and Kashmir
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सरकारों की अनदेखी के चलते विश्व प्रसिद्ध कश्मीरी अखरोट बाजार प्रतिस्पर्धा में चाइनीज अखरोट का मुकाबला नहीं कर पा रहा है। यही हाल सेब का भी है। देश में 85 फीसदी सेब पैदा करने वाले जम्मू-कश्मीर के बगीचा मालिकों से राजनेताओं ने मीठे वादे तो किए लेकिन आज तक न बड़ी मंडी बन पाई, न ही ग्रेडिंग सुविधा मिली।
हकीकत यह है कि सेब हेल नेट, मंडीकरण, मूल्य संबर्धन का ढांचा प्रदेश में नहीं है। अखरोट के अच्छे दाम के लिए प्रोसैसिंग-पैकेजिंग यूनिट होना जरूरी है, लेकिन यह मांग दशकों से लटकी है। जीआई टैगिंग और आर्गेनिक प्रमाण पत्र दिलाने का वादा भी पूरा नहीं हो पाया है। नेताओं के वादे में जम्मू-कश्मीर में 25158.2 हजार हेक्टेयर में बागवानी करने वाले किसान पिसते जा रहे हैं।
बागवानी विभाग के अनुसार, सेब की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सबसे बुनियादी सुविधा वैक्सिंग तक प्रदेश में नहीं है। कश्मीर अखरोटा का हाल यह है कि बाजार में छोटे आकार का स्थानीय अखरोट 800 रुपये तो चाइनीज 400 रुपये प्रति किलो बिक रहा है।
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स्थानीय अखरोट की कीमत कम होने का बड़ा कारण इसकी तुड़ाई के बाद प्रोसैसिंग नहीं हो पाना है। प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने का दूसरा बड़ा कारण इसको आर्गेनिग सर्टीफिकेट नहीं मिल पाना है। सरकारें इसे जीआई टैग भी नहीं दिला पाई हैं।
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हकीकत यह है कि सेब हेल नेट, मंडीकरण, मूल्य संबर्धन का ढांचा प्रदेश में नहीं है। अखरोट के अच्छे दाम के लिए प्रोसैसिंग-पैकेजिंग यूनिट होना जरूरी है, लेकिन यह मांग दशकों से लटकी है। जीआई टैगिंग और आर्गेनिक प्रमाण पत्र दिलाने का वादा भी पूरा नहीं हो पाया है। नेताओं के वादे में जम्मू-कश्मीर में 25158.2 हजार हेक्टेयर में बागवानी करने वाले किसान पिसते जा रहे हैं।
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बागवानी विभाग के अनुसार, सेब की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सबसे बुनियादी सुविधा वैक्सिंग तक प्रदेश में नहीं है। कश्मीर अखरोटा का हाल यह है कि बाजार में छोटे आकार का स्थानीय अखरोट 800 रुपये तो चाइनीज 400 रुपये प्रति किलो बिक रहा है।
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स्थानीय अखरोट की कीमत कम होने का बड़ा कारण इसकी तुड़ाई के बाद प्रोसैसिंग नहीं हो पाना है। प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने का दूसरा बड़ा कारण इसको आर्गेनिग सर्टीफिकेट नहीं मिल पाना है। सरकारें इसे जीआई टैग भी नहीं दिला पाई हैं।
प्रदेश भर में 70 हजार हेक्टेयर रकबा अखरोट की बागवानी के अधीन है। कश्मीर सालाना एक लाख 99 हजार मीट्रिक टन अखरोट की पैदावार करता है। कुल उत्पादन का 85 फीसदी अखरोट प्रदेश से बाहर और विदेश में जाता है। जीआई टैग और आर्गेनिक सर्टीफिकेट न होने से बीते तीन साल से निर्यात में 30 से 40 फीसदी की गिरावट आई है। इसी प्रकार सरकार की भागीदारी नहीं होने से 85 फीसदी सेब पैदा करने के बावजूद हम विदेश में केवल 5 लाख टन ही बेच पा रहे हैं।
बगीचों में बर्बाद हो रहा पांच लाख टन सेब
सेब की पेटी का औसतन दाम प्रदेश में 400 रुपये मिल रहा है जबकि इतना सेब पैदा करने खर्च ही 500 रुपये आ जाता है। जब बागवान स्थानीय स्तर पर दाम न मिलने से अपनी पैदावार को दूसरे प्रदेश में ले जाने का प्रयास करता है, तो हाईवे सबसे बड़ी परेशानी पैदा करता है। राष्ट्रीय राजमार्ग बंद रहने से ट्रकों में ही फसल का रंग खराब हो जाता है और दाम आधा रह जाता है। जम्मू-कश्मीर का सेब अगस्त से शुरू हो जाता है और नवंबर तक रहता है। पांच लाख टन सेब बगीचे में हो बर्बाद हो रहा है। अब तक कश्मीर तक ट्रेन की सुविधा देने पर काम चल रहा है। इससे सेब ले जाना आसान होगा।
सेब की पेटी का औसतन दाम प्रदेश में 400 रुपये मिल रहा है जबकि इतना सेब पैदा करने खर्च ही 500 रुपये आ जाता है। जब बागवान स्थानीय स्तर पर दाम न मिलने से अपनी पैदावार को दूसरे प्रदेश में ले जाने का प्रयास करता है, तो हाईवे सबसे बड़ी परेशानी पैदा करता है। राष्ट्रीय राजमार्ग बंद रहने से ट्रकों में ही फसल का रंग खराब हो जाता है और दाम आधा रह जाता है। जम्मू-कश्मीर का सेब अगस्त से शुरू हो जाता है और नवंबर तक रहता है। पांच लाख टन सेब बगीचे में हो बर्बाद हो रहा है। अब तक कश्मीर तक ट्रेन की सुविधा देने पर काम चल रहा है। इससे सेब ले जाना आसान होगा।
इतनी रही पैदावार
वर्ष 2023- 24 के लिए बागवानी विभाग ने 21 लाख एमटी पैदावार का लक्ष्य रखा था लेकिन उत्पादन 20 लाख टन के करीब हुआ। क्योंकि तूफान ने एक लाख टन सेब बगीचों में ही गिराकर खराब कर दिया। 2022-23 में भी तूफान से छह लाख टन फसल बर्बाद हुई। तूफान हर साल बीस फीसदी फसल को बर्बाद कर रहा है। बागवानी विभाग के कहने पर एक प्राइवेट कंपनी ने सी ग्रेड के सेब का पल्प बनाने की मशीनरी स्थापित की है। इससे सेब से चिप्स बनाए जा रहे हैं। इससे पहले इस सेब की कीमत नहीं मिल पाती थी।
वर्ष 2023- 24 के लिए बागवानी विभाग ने 21 लाख एमटी पैदावार का लक्ष्य रखा था लेकिन उत्पादन 20 लाख टन के करीब हुआ। क्योंकि तूफान ने एक लाख टन सेब बगीचों में ही गिराकर खराब कर दिया। 2022-23 में भी तूफान से छह लाख टन फसल बर्बाद हुई। तूफान हर साल बीस फीसदी फसल को बर्बाद कर रहा है। बागवानी विभाग के कहने पर एक प्राइवेट कंपनी ने सी ग्रेड के सेब का पल्प बनाने की मशीनरी स्थापित की है। इससे सेब से चिप्स बनाए जा रहे हैं। इससे पहले इस सेब की कीमत नहीं मिल पाती थी।
इन फसलों की भी होती है पैदावार
सेब के अलावा प्रदेश में नाशपाती, खुबानी, आड़ू, पल्म, चेरी, लीची, आम, अनोला, अमरूद, कीवी, स्ट्राबेरी, संतरा, नींबू की 21 लाख 40 हजार 148 टन पैदावार हो रही है। ड्राईफ्रूट में अखरोट, बादाम और अन्य फ्रूट की पैदावार दो लाख एमटी के आसपास हो रही है।
सेब के अलावा प्रदेश में नाशपाती, खुबानी, आड़ू, पल्म, चेरी, लीची, आम, अनोला, अमरूद, कीवी, स्ट्राबेरी, संतरा, नींबू की 21 लाख 40 हजार 148 टन पैदावार हो रही है। ड्राईफ्रूट में अखरोट, बादाम और अन्य फ्रूट की पैदावार दो लाख एमटी के आसपास हो रही है।
नहीं कोई बड़ी मंडी
बागवानों का एक बड़ा मुद्दा प्रदेश में सेब के लिए बड़ी मंडी नहीं होना भी है। सेब यहां से स्थानीय मंडी के जरिये एक्सपोर्ट होना चाहिए जबकि हो उल्टा रहा है। ग्रेडिंग की सुविधा के मशीन नहीं होने से सेब सीधा दिल्ली की आजादपुर मंडी जा रहा है और वहीं से बंगलादेश या फिर कभी-कभार अमरीका एक्सोपोर्ट होता है। यहां के बागवान आज भी सेब की ग्रेडिंग हाथ से ही करते हैं।
बागवानों का एक बड़ा मुद्दा प्रदेश में सेब के लिए बड़ी मंडी नहीं होना भी है। सेब यहां से स्थानीय मंडी के जरिये एक्सपोर्ट होना चाहिए जबकि हो उल्टा रहा है। ग्रेडिंग की सुविधा के मशीन नहीं होने से सेब सीधा दिल्ली की आजादपुर मंडी जा रहा है और वहीं से बंगलादेश या फिर कभी-कभार अमरीका एक्सोपोर्ट होता है। यहां के बागवान आज भी सेब की ग्रेडिंग हाथ से ही करते हैं।
पैदावार बढ़ाने पर चल रहा शोधअखरोट की पैदावार बढ़ाने पर शोध चल रहा है। बागवानों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अखरोट आर्गेनिक तरीके से तैयार होता है। यही कश्मीरी अखरोट की खास पहचान है।- डा. प्रशांत बख्शी, एचओडी बागवानी, स्कास्ट
फलों का कारोबार पहले की अपेक्षा बढ़ा है। बागवानों को मंडियां मुहैया करवाई जा रही है। प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित करने के लिए मसला उच्च अधिकारियों के ध्यान में है।- चमन लाल, निदेशक, बागवानी विभाग