हाईकोर्ट ने सरकार से कहा- चार हफ्ते में दें 'अलगाववादियों की सुरक्षा और खर्च का ब्योरा'
याचिका में कहा गया कि 1990 से ही अलगाववादी और हुरिर्यत नेता कश्मीर में हिंसा भड़का रहे हैं। इन लोगों की वजह से हजारों लोगों की जान चली गई। इनकी वजह से कश्मीर में 1990 के बाद से ही युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं। फिर भी इनको सरकारी सुरक्षा दी गई है, जिसे हटाना चाहिए। क्यों इन्हें सुरक्षा कवर दिया गया है।
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अलगाववादियों और हुर्रियत नेताओं को दी गई सुरक्षा पर सरकार से फिर जवाब मांगा गया है। चार हफ्तों के भीतर सरकार को बताना होगा कि कितने अलगाववादियों, हुर्रियत नेताओं और देश विरोधी लोगों को सुरक्षा दी गई है। इन पर कितना खर्च किया जा रहा है।
कोर्ट में दीवाकर शर्मा की ओर से जनहित याचिका दायर कर इन लोगों की सुरक्षा हटाने की मांग की गई थी। चीफ जस्टिस गीता मित्तल और राजेश बिंदल वाली खंडपीठ ने बुधवार को इस याचिका पर सुनवाई की। सरकार को चार हफ्तों को वक्त दिया और इसकी स्टेटस रिपोर्ट मांगी।
हिंसा फैलाने वालों को सुरक्षा क्यों?
याचिका में कहा गया कि 1990 से ही अलगाववादी और हुरिर्यत नेता कश्मीर में हिंसा भड़का रहे हैं। इन लोगों की वजह से हजारों लोगों की जान चली गई। फिर भी इनको सरकारी सुरक्षा दी गई है, जिसे हटाना चाहिए। क्यों इन्हें सुरक्षा कवर दिया गया है। देश विरोधी और इन लोगों से सुरक्षा वापस लेनी चाहिए। इनकी वजह से कश्मीर में 1990 के बाद से ही युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं।
याचिका में यह भी कहा गया
एक तरफ देश के बाहर पड़ोस में दुश्मन हैं, तो दूसरी तरफ इनके रूप में देश के भीतर दुश्मन हैं। जो आतंकवाद को बढ़ावा देने में लगे हैं। हिंसा फैलाकर माहौल खराब करते हैं। देश के विरोध में बात करते हैं। देश के लोगों का पैसा इनकी सुरक्षा में खर्च नहीं होना चाहिए।
बेशक सरकार की तरफ से आतंकवाद और अलगाववाद से निपटने के लिए पॉलिसी बनी होगी। लेकिन आम नागरिकों के पैसों का इन लोगों लोगों की सुरक्षा पर खर्च करने की कोई पालिसी नहीं हो सकती। आम लोगों का पैसा इनकी सुरक्षा पर खर्च करना बंद होना चाहिए।
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