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जम्मू-कश्मीर से ग्राउंड रिपोर्ट : आतंक के गढ़ रहे इलाकों से सरहद तक अमन की बयार

Mon, 07 Jun 2021 03:25 AM IST
दुष्यंत शर्मा बविंद्र वशिष्ठ, उड़ी (बारामुला)
बविंद्र वशिष्ठ, उड़ी (बारामुला) Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Mon, 07 Jun 2021 03:25 AM IST
सार

  • कश्मीर की बदल रही आबोहवा
  • पत्थरबाजी घटी और प्रदर्शन भी बंद
  • एलओसी तक खुला आम लोगों के लिए रास्ता

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Ground report from Jammu and Kashmir: Winds of peace from the bastions of terror to the border
उड़ी में कमान पोस्ट पर लहराता 60 फीट ऊंचा तिरंगा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कश्मीर की आबोहवा बदल रही है। आतंक के गढ़ रहे इलाकों से सरहद तक अमन की बयार बहने लगी है। अब सड़कों पर न पत्थरबाज दिखते हैं और न ही राष्ट्र विरोधी प्रदर्शन करने वाले। गांवों-शहरों में सरकारी इमारतों से लेकर सरहद तक तिरंगा फहर रहा है। आतंकवाद को दरकिनार कर युवा पीढ़ी काम धंधे में जुटने लगी है। 

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हालांकि, कुछ इलाकों में आतंकी घटनाएं हो रही हैं, लेकिन सुरक्षा बलों के सख्त रुख के चलते ज्यादातर आतंकी व उनके मददगार गायब होने लगे हैं। बदले हालात में अब नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर भी शांति है। पाकिस्तान से समझौते के बाद दोनों ओर बंदूकें खामोश हैं। इसी बीच, सेना ने उड़ी की आखिरी कमान पोस्ट अवाम के लिए खोल दी है। तीनों ओर से पाकिस्तान से घिरी इस चौकी पर लहराते 60 फीट ऊंचे तिरंगे के साथ आम लोगों के लिए दो हफ्ते पहले खुला कैफे एलओसी पर स्थिति को बयां कर रहा है। अब यहां नागरिकों के आने पर सफेद झंडा नहीं लगाना पड़ता।
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 श्रीनगर से उत्तरी कश्मीर के बारामुला और उड़ी की ओर जाते पट्टन वैली में हाईवे किनारे सेब के खूबसूरत बागों में लोग काम में मशगूल हैं। कभी आतंक के गढ़ रहे बारामुला में भी माहौल बदला है। पत्थरबाजी के लिए बदनाम यहां के ओल्ड टाउन में अब हुड़दंगी नहीं दिखते हैं। बारामुला के मुज्जफर बताते हैं कि झेलम में बहुत पानी बह चुका है। आतंकवाद से लोगों को कुछ मिला नहीं, सिर्फ तबाही हुई है। 
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एक साल से यहां अमन हैं। यहीं दुकान पर बैठे सफेद दाढ़ी वाले व्यक्ति से जब माहौल पर बात की तो उन्होंने सड़क के निचली ओर दफनाए आतंकियों की ओर इशारा कर कहा, हुकूमत का संदेश सबकी समझ में आ रहा है। अब कोई बचाने नहीं आएगा। काम के सिलसिले में उड़ी आए एलओसी से सटे क्षेत्र के ग्रामीण ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि कोरोना संकट में सेना उनकी बहुत मदद कर रही है।

उधर, दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग और पुलवामा में भी हालात काफी बदल रहे हैं। अनंतनाग के अनीश अहमद का कहना है कि आतंकवाद का यहां भारी नुकसान हुआ है। युवा अब इस रास्ते पर नहीं जाना चाहते। कश्मीर के लोग खुद को संभालने की कोशिश कर रहे हैं। अनुच्छेद 370 का चंद लोगों ने फायदा उठाया। बदले माहौल में अब सड़कें बनने लगी हैं। विकास के और भी काम शुरू हुए हैं। अनंतनाग के ही तारिक अहमद ने कहा कि हालात सामान्य हो रहे हैं। कुदरत ने हमें जन्नत बख्शी है, लेकिन दहशतगर्दी से घाटी बदनाम हो गई। अब लोगों को सब समझ में आ रहा है। उम्मीद है जल्द ही कश्मीर पर्यटकों से फिर गुलजार होगा।   

पुलवामा को छोड़ इस साल पत्थरबाजी की बड़ी घटना नहीं
अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाओं में काफी कमी आई है। घाटी में साल 2019 में पथराव की 1999 घटनाएं सामने आईं, जबकि 2020 में 255 बार ही पत्थरबाजी हुई। इस साल 2 मई को पुलवामा के डागरपोरा में मुठभेड़ के दौरान आतंकियों को बचाने के लिए लोगों ने पथराव किया। इसके बाद बारपोरा में 12 मई को भी नकाबपोशों ने पथराव किया था। इसके अलावा साल 2021 में पत्थरबाजी की कोई बड़ी घटना सामने नहीं आई है। इससे पूर्व 2018 और 2017 में पत्थरबाजी की क्रमश: 1458 और 1412 घटनाएं दर्ज हुईं थीं।

कश्मीरी पंडित भी करने लगे घाटी का रुख
बदली आबोहवा में अब कश्मीरी पंडित भी लौटने लगे हैं। धार्मिक महत्त्व के मट्टन में कभी कश्मीरी पंडितों के 500 से ज्यादा परिवार रहते थे, लेकिन 1990 में बदली परिस्थितियों ने उन्हें अपना घर-गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया। मट्टन के ऐतिहासिक मंदिर में वर्षों से सेवा कर रहे वयोवृद्ध सुरेंद्र खेर ने बताया कि कश्मीरी पंडित अब लौट रहे हैं। मट्टन में कश्मीरी पंडितों के 20 परिवार हो गए हैं। करीब 30 वर्ष पहले पलायन कर गए लोग फिर घाटी में मकान बना रहे हैं। उनका कहना है कि कश्मीर बदल रहा है। सभी अमन चाहते हैं।



पर्यटकों को लुभाने लगीं दिलकश वादियां
कोरोना के चलते भले ही लोग घरों से कम निकल रहे, लेकिन कश्मीर की दिलकश वादियां पर्यटकों को खींचने लगी हैं। बदले हालातों का पर्यटन पर असर दिखने लगा है। पर्यटन कारोबारियों का कहना है कि इस साल शुरू में काफी सैलानियों ने घाटी का रुख किया। पहलगाम में पर्यटन से जुड़े फयाज और जावेद अहमद का कहना है कि जनवरी- फरवरी में बड़ी तादाद में पहुंचे पर्यटकों ने उम्मीद जगाई है। बेशक, इसके बाद कोरोना की दूसरी लहर ने सब कुछ चौपट कर दिया लेकिन आने वाले समय में फिर कश्मीर पर्यटकों की पहली पसंद होगा। उधर, श्रीनगर में डल झील किनारे भी सुबह-शाम रौनक दिखने लगी है। हालांकि, पर्यटक कम हैं, लेकिन लोग बेफिक्र होकर परिवार के साथ टहल रहे हैं। 

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