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Jammu News: साहित्य-संस्कृति समागम ने बिखेरे डुग्गर संस्कृति के रंग
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- दो दिवसीय आयोजन में भाषा, साहित्य और डुग्गर संस्कृति की विरासत पर हुई चर्चा
- लोक कलाकारों और बीएसएफ बैंड की प्रस्तुतियों से सजा समापन समारोह
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय साहित्य-संस्कृति समागम शनिवार को संपन्न हो गया। दो दिनों तक विवि परिसर साहित्य, संवाद और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से गुलजार रहा। इस दौरान डुग्गर क्षेत्र की भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं पर चर्चा हुई। प्रतियोगिताओं और लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को यादगार बना दिया।
समापन सत्र में कुलपति प्रो. उमेश राय ने कहा कि डुग्गर क्षेत्र की पहचान उसकी समृद्ध परंपराओं, भाषाओं और सामाजिक जीवन से बनी है।विश्वविद्यालयों को केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि क्षेत्र की भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए।कुलपति ने अरविंद ज्ञान केंद्र का उल्लेख करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय डुग्गर क्षेत्र की साहित्यिक और बौद्धिक धरोहर को संरक्षित करने और लोगों तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयास कर रहा है। दो दिनों तक चले इस आयोजन में साहित्यकारों, कलाकारों, पत्रकारों और छात्रों ने भाग लिया। इस दौरान डोगरा कला, संस्कृति और पारंपरिक व्यंजनों की भी झलक देखने को मिली। समागम ने जम्मू की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश दिया। समागम के दौरान आयोजित प्रतियोगिताओं में विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के छात्रों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पद्मा सचदेव सुर संवाद में आयोजित भाषण प्रतियोगिता में 43 छात्रों ने भाग लिया। इसमें महिला कॉलेज गांधी नगर की माही गुप्ता पहले, जीडीसी कठुआ के राहुल ठाकुर दूसरे और महिला कॉलेज परेड की ओजस्वी राजपूत तीसरे स्थान पर रहीं।
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डुग्गर संस्कृति की विरासत पर हुई चर्चा, युवाओं को संस्कृति से जोड़ने पर जोर
कार्यक्रम के दौरान जम्मू संस्कृति की व्यापकत” विषय पर पैनल चर्चा आयोजित की गई। इसमें पद्मश्री प्रो. शिव निर्मोही, प्रो. एमके वकार, डॉ. हरसिमरन सिंह, डॉ. फारूक अनवर मिर्जा, चंदर कांत और धर्मेंद्र सिंह ने अपने विचार रखे। प्रो. शिव निर्मोहीने कहा कि डुग्गर संस्कृति की जड़ें प्राचीन परंपराओं, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़ी हैं। भद्रवाह, पाडर और पहाड़ी क्षेत्रों के साथ-साथ पंजाबी सांस्कृतिक प्रभाव ने भी जम्मू की मिश्रित सांस्कृतिक पहचान को आकार दिया है। दोपहर के सत्र में अरुण मनहास के संचालन में एक अन्य पैनल चर्चा आयोजित की गई। इसमें पद्मश्री मोहन सिंह, डॉ. बलजीत सिंह रैना, डॉ. राजवीर सिंह, प्रो. असदुल्ला वानी, सरस भारती और सुभाष ब्रहमणु ने भाषा, सिनेमा और साहित्य की भूमिका पर अपने विचार रखे। पद्मश्री मोहन सिं ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं से युवाओं का जुड़ाव बेहद जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से जम्मू की लोक परंपराओं, साहित्य और कला को देश-दुनिया तक पहुंचाया जा सकता है।
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जम्मू को बताया संस्कृतियों का गुलदस्ता, लोक कलाकारों ने मोहा दर्शकों का मन
समापन सत्र में पीआईबी जम्मू की निदेशक नेहा जलाली, वरिष्ठ पत्रकार निशिकांत खजूरिया, नवीन नवाज और दया सागर ने जम्मू की सांस्कृतिक पहचान पर अपने विचार रखे। चर्चा का संचालन प्रदीप दत्ता ने किया। वक्ताओं ने कहा कि जम्मू विभिन्न संस्कृतियों का गुलदस्ता है। डोगरा, पहाड़ी, गुज्जर-बकरवाल और पहाड़ी क्षेत्रों की परंपराएं मिलकर इसकी समृद्ध सांस्कृतिक पहचान बनाती हैं। कार्यक्रम में डुग्गर क्षेत्र की लोक संस्कृति को दर्शाने वाली प्रस्तुतियां भी हुईं। मास्टर करतार चंद, खजूर सिंह, मोहित सोनी और सोहन कुमार सहित कई कलाकारों ने लोक संगीत और नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। दर्शन पताखा, स्लाठिया ब्रदर्स और बिशन दास की प्रस्तुतियों ने भी कार्यक्रम में रंग भर दिए। समापन समारोह में बीएसएफ बैंड और पाइप बैंड की प्रस्तुति ने भी कार्यक्रम को खास बना दिया।
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- लोक कलाकारों और बीएसएफ बैंड की प्रस्तुतियों से सजा समापन समारोह
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। जम्मू विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय साहित्य-संस्कृति समागम शनिवार को संपन्न हो गया। दो दिनों तक विवि परिसर साहित्य, संवाद और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से गुलजार रहा। इस दौरान डुग्गर क्षेत्र की भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं पर चर्चा हुई। प्रतियोगिताओं और लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम को यादगार बना दिया।
समापन सत्र में कुलपति प्रो. उमेश राय ने कहा कि डुग्गर क्षेत्र की पहचान उसकी समृद्ध परंपराओं, भाषाओं और सामाजिक जीवन से बनी है।विश्वविद्यालयों को केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि क्षेत्र की भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए।कुलपति ने अरविंद ज्ञान केंद्र का उल्लेख करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय डुग्गर क्षेत्र की साहित्यिक और बौद्धिक धरोहर को संरक्षित करने और लोगों तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयास कर रहा है। दो दिनों तक चले इस आयोजन में साहित्यकारों, कलाकारों, पत्रकारों और छात्रों ने भाग लिया। इस दौरान डोगरा कला, संस्कृति और पारंपरिक व्यंजनों की भी झलक देखने को मिली। समागम ने जम्मू की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश दिया। समागम के दौरान आयोजित प्रतियोगिताओं में विभिन्न कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के छात्रों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पद्मा सचदेव सुर संवाद में आयोजित भाषण प्रतियोगिता में 43 छात्रों ने भाग लिया। इसमें महिला कॉलेज गांधी नगर की माही गुप्ता पहले, जीडीसी कठुआ के राहुल ठाकुर दूसरे और महिला कॉलेज परेड की ओजस्वी राजपूत तीसरे स्थान पर रहीं।
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डुग्गर संस्कृति की विरासत पर हुई चर्चा, युवाओं को संस्कृति से जोड़ने पर जोर
कार्यक्रम के दौरान जम्मू संस्कृति की व्यापकत” विषय पर पैनल चर्चा आयोजित की गई। इसमें पद्मश्री प्रो. शिव निर्मोही, प्रो. एमके वकार, डॉ. हरसिमरन सिंह, डॉ. फारूक अनवर मिर्जा, चंदर कांत और धर्मेंद्र सिंह ने अपने विचार रखे। प्रो. शिव निर्मोहीने कहा कि डुग्गर संस्कृति की जड़ें प्राचीन परंपराओं, लोक कथाओं और ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़ी हैं। भद्रवाह, पाडर और पहाड़ी क्षेत्रों के साथ-साथ पंजाबी सांस्कृतिक प्रभाव ने भी जम्मू की मिश्रित सांस्कृतिक पहचान को आकार दिया है। दोपहर के सत्र में अरुण मनहास के संचालन में एक अन्य पैनल चर्चा आयोजित की गई। इसमें पद्मश्री मोहन सिंह, डॉ. बलजीत सिंह रैना, डॉ. राजवीर सिंह, प्रो. असदुल्ला वानी, सरस भारती और सुभाष ब्रहमणु ने भाषा, सिनेमा और साहित्य की भूमिका पर अपने विचार रखे। पद्मश्री मोहन सिं ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाओं और सांस्कृतिक परंपराओं से युवाओं का जुड़ाव बेहद जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से जम्मू की लोक परंपराओं, साहित्य और कला को देश-दुनिया तक पहुंचाया जा सकता है।
जम्मू को बताया संस्कृतियों का गुलदस्ता, लोक कलाकारों ने मोहा दर्शकों का मन
समापन सत्र में पीआईबी जम्मू की निदेशक नेहा जलाली, वरिष्ठ पत्रकार निशिकांत खजूरिया, नवीन नवाज और दया सागर ने जम्मू की सांस्कृतिक पहचान पर अपने विचार रखे। चर्चा का संचालन प्रदीप दत्ता ने किया। वक्ताओं ने कहा कि जम्मू विभिन्न संस्कृतियों का गुलदस्ता है। डोगरा, पहाड़ी, गुज्जर-बकरवाल और पहाड़ी क्षेत्रों की परंपराएं मिलकर इसकी समृद्ध सांस्कृतिक पहचान बनाती हैं। कार्यक्रम में डुग्गर क्षेत्र की लोक संस्कृति को दर्शाने वाली प्रस्तुतियां भी हुईं। मास्टर करतार चंद, खजूर सिंह, मोहित सोनी और सोहन कुमार सहित कई कलाकारों ने लोक संगीत और नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। दर्शन पताखा, स्लाठिया ब्रदर्स और बिशन दास की प्रस्तुतियों ने भी कार्यक्रम में रंग भर दिए। समापन समारोह में बीएसएफ बैंड और पाइप बैंड की प्रस्तुति ने भी कार्यक्रम को खास बना दिया।