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Jammu News: सीखने की ललक ने 51 के वैज्ञानिक को बना दिया छात्र

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नोट - फोटो ट्रैक पर
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- डीआरडीओ के वैज्ञानिक डॉ. अरुण रॉय ने 56 की उम्र में की पीएचडी
- गन बैरल को मजबूत बनाने की तकनीक सीखने के लिए आईआईटी जम्मू से की पढ़ाई
- जोरावर लाइट टैंक समेत कई रक्षा प्रोजेक्टों से जुड़े हैं

गौरव रावत

जम्मू। जिस काम में करीब तीन दशक बिताए, उसी में कुछ नया सीखने के लिए डीआरडीओ के वैज्ञानिक डॉ. अरुण कुमार रॉय 51 की उम्र में फिर छात्र बन गए। गन बैरल को मजबूत बनाने की एक नई तकनीक उनके लिए नया विषय था। उन्होंने आईआईटी जम्मू में पीएचडी की पढ़ाई शुरू कर दी। वर्ष 2021 में शुरू की पढ़ाई अब डिग्री मिलने के साथ 56 की उम्र में पूरी हुई है।

बिहार के मधुबनी के रहने वाले डॉ. रॉय ने वर्ष 1996 में एमआईटी मुजफ्फरपुर से बीटेक किया और उसी साल डीआरडीओ में शामिल हुए। वर्ष 2002 में आईआईटी बॉम्बे से एमटेक किया। वह गन बैरल को मजबूत बनाने वाली हाइड्रोलिक ऑटोफ्रेटेज तकनीक के विशेषज्ञ हैं। गन बैरल यानी बंदूक या तोप की वह लंबी नली जिससे गोली या गोला बाहर निकलता है। ऑटोफ्रेटेज में धातु को इस तरह मजबूत किया जाता है कि वह फायरिंग के दौरान पड़ने वाले भारी दबाव को सह सके। आईआईटी जम्मू में उन्हें थर्मल ऑटोफ्रेटेज पर काम करने का मौका मिला। यह उनके लिए नया विषय था। हाइड्रोलिक ऑटोफ्रेटेज में दबाव देकर गन बैरल की धातु को मजबूत किया जाता है, जबकि थर्मल ऑटोफ्रेटेज में ताप के असर से धातु के भीतर बनने वाले तनावों को नियंत्रित कर मजबूती बढ़ाने का अध्ययन किया जाता है।
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उम्र नहीं बनी रुकावट, छोटे गाइड के साथ बने टॉपर

ड़ॉ. रॉय कहते हैं कि करीब 30 साल बाद दोबारा बुनियादी विषयों की पढ़ाई करना आसान नहीं था। खासकर तब, जब वह नौकरी के साथ पीएचडी कर रहे थे। दिनभर ऑफिस में रहने के बाद रात करीब नौ बजे से पढ़ाई शुरू करते और रात एक बजे तक पढ़ते थे। इस पूरे सफर में परिवार का भी उन्हें पूरा सहयोग मिला। उनके पीएचडी गाइड उनसे करीब 16 साल छोटे हैं, इसके बावजूद वह पीएचडी में टॉपर रहे। डॉ. रॉय कहते हैं कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती।

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नौकरी के साथ भी सीखना जारी, अगली पारी में पढ़ाने की तैयारी

डॉ. रॉय फिलहाल पुणे में डीआरडीओ के वेपन सिस्टम और आर्टिलरी गन ग्रुप के ग्रुप डायरेक्टर हैं। वह जोरावर लाइट टैंक समेत पांच रक्षा प्रोजेक्टों से जुड़े हैं। जोरावर 25 टन का टैंक है, जो अत्यधिक ऊंचाई, कम ऑक्सीजन और कठिन बर्फीले रास्तों पर भी 70 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकता है। उनके मुताबिक जोरावर का डिजाइन तैयार हो चुका है और अब इसका निर्माण चल रहा है। वह 2030 के आसपास डीआरडीओ से सेवानिवृत्त होंगे। इसके बाद प्रोफेसर बनकर पढ़ाने की योजना है।
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