'कश्मीर में राष्ट्रवाद को मुद्दा न बनाएं'
- अलग-अलग सियासी पार्टियों के ज़रिए इसे सियासी रंग देना कश्मीर से खिलवाड़ करने के समान है।
- क्रिकेट को लेकर छात्रों के दो गुटों के बीच झड़प और मतभेद मेरठ और दूसरे शहरों में पहले भी हो चुके हैं।
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भारत माता की जय' का विवाद हो या क्रिकेट से जुड़े राष्ट्रवाद का मामला, कश्मीर अगर इन मुद्दों का अखाड़ा बना तो ये देश के हित में नहीं होगा।
श्रीनगर के एनआईटी में कश्मीरी और ग़ैर-कश्मीरी छात्रों की झड़पों के बाद अलग-अलग सियासी पार्टियों के ज़रिए इसे सियासी रंग देना कश्मीर से खिलवाड़ करने के समान है।
जो श्रीनगर के एनआईटी में हुआ उसकी निंदा की जानी चाहिए, ग़ैर-कश्मीरी छात्रों की पिटाई के लिए पुलिस की आलोचना भी की जानी चाहिए लेकिन जवानी के जोश में छात्रों से हुई ग़लती को देश की अखंडता पर प्रहार या इसका अपमान नहीं समझना चाहिए।
युवाओं का इस्लामी कट्टरता की तरफ़ रुझान तेज़ी से बढ़ रहा है
क्रिकेट को लेकर छात्रों के दो गुटों के बीच झड़प और मतभेद मेरठ और दूसरे शहरों में पहले भी हो चुके हैं। कश्मीरी छात्रों की गिरफ्तारियां हो चुकी हैं लेकिन इन मामलों को सियासी रंग देने की कोशिश नहीं की गयी।
लेकिन श्रीनगर मेरठ नहीं है। कश्मीर में सालों से मिलिटेंसी जारी है। युवाओं का इस्लामी कट्टरता की तरफ़ रुझान तेज़ी से बढ़ रहा है। आम जनता भारत के खिलाफ़ अपने ग़ुस्से का इज़हार मारे गए मिलिटेंट्स के जनाज़ों में हज़ारों की संख्या में शामिल होकर करती है।
ढाई महीने के समय के बाद सोमवार को जम्मू और कश्मीर की चुनी सरकार ने सत्ता दोबारा संभाल लिया। लेकिन पीडीपी-बीजेपी की मिली जुली सरकार का केवल चलना ही काफ़ी नहीं होगा बल्कि इसका प्रभावशाली तरीके से चलना भी कश्मीर के लिए ज़रूरी है।
कश्मीर में देश भक्ति से जुड़े विवादों को तूल देने से वहां की जनता और भी अलग-थलग महसूस करने लगेगी। कश्मीर से बाहर पढ़ाई करने के लिए आने वाले कश्मीरी युवा घर से निकलने से हिचकिचाहट महसूस कर सकते हैं।
दूसरे राज्यों में पड़ने वाले कश्मीरियों पर पड़ सकता है इसका असर
घाटी में भारत विरोधी भावनाएं आम है। पिछले 27 सालों में जब से मिलिटेंसी शुरू हुई है, सरकार ने कश्मीरियों के दिल और दिमाग़ जीतने की अनथक कोशिशें की हैं लेकिन अधिकतर कश्मीरी भारत विरोधी होने का इज़हार करते हैं।
श्रीनगर में हुए झड़पों के बाद जिस तरह से सियासी पार्टियां मामले को राजनितिक रूप दे रही हैं वो बिलकुल सही नहीं है। इससे भारत के दूसरे शहरों में पढ़ाई करने वाले कश्मीरी छात्रों से होने वाले भेदभाव में इज़ाफ़ा भी हो सकता है।
जानकारों का कहना है कि कश्मीर आज मिलिटेंसी के दौर की वापसी के कगार पर खड़ा है। देश भक्ति की बहस से सियासी माहौल कई गुना खराब हो सकता है।