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बधाई, खानपान, पहनावा और खुशियों के तरीके बदले
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बाड़ी ब्राह्मण। दिवाली का त्योहार सबसे बड़ा माना जाता है। यह पर्व हर किसी के लिए खुशियां लेकर आता है। अगर 25 वर्ष पुरानी दिवाली और वर्तमान दिवाली को देखा जाए तो उसमें बड़ा अंतर हो गया है। तब से आज तक में बधाई, खानपान, पहनावा और खुशियां बांटने के तरीके में बड़ा बदलाव आ गया है।
आधुनिक समय में दिवाली की बधाई मोबाइल के जरिये दी जाने लगी है। ज्यादा से ज्यादा वीडियो कॉल कर पर्व की खुशियों को एक दूसरे के साथ साझा किया जाता है। दूसरी ओर पुराने समय में दिवाली के त्योहार पर अपने से दूर सगे संबंधियों को चिट्ठी भेजकर बधाई संदेश भेजे जाते थे। या दिवाली पर अपनों के साथ खुशियां साझा करने के लिए लोग घर आ जाते थे। परिवार के साथ दिवाली की खुशियां मनाते थे। ज्यादातर लोगों की यही कोशिश होती कि दिवाली का त्योहार अपने घर के सदस्यों के बीच मनाया जाए।
आधुनिकता के दौर में दिवाली पर ज्यादातर लोग खानपान के लिए होटल और रेस्टोरेंट में जाते हैं। या पैकिंग खाना बाहर से मंगवाया जाता है। मिठाइ के डिब्बे भी बाजार से खरीद कर एक दूसरे को भेजे जाते हैं, लेकिन पूर्व में खानपान, मिठाई, पकवान घर में ही बनाता जाता था। परिवार के सभी सदस्य इकट्ठे खाना खाते थे। बर्फी जलेबी और अन्य प्रकार के मिष्ठान घरों में ही तैयार किए जाते थे। आस पड़ोस में मिठाई बांटकर लोग खुशियों का इजहार करते थे। एक दूसरे को बधाइयां देते थे। गांव में ज्यादातर राजमा चावल पूरियां और सुच्चियां मुख्य खाना बनाया जाता था।
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बदल गए बच्चों के खिलौने
आधुनिक दिवाली में बच्चों के खिलौने भी बदल गए हैं। पूर्व में मिट्टी के खिलौने हाथी, घोडे़े, बैलगाड़ी सतेम अनेक प्रकार के खिलौने बच्चों के लिए होते थे। अब बम, पटाखे फोड़े जाते हैं। पुराने समय में बच्चों के लिए घर पर ही लकड़ी के पिस्तौल, रेत के बम और गुब्बारे दिए जाते थे।
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आधुनिक दिवाली में जहां मोमबत्तियां, झालर और लड़ी से घर रोशन किया जाता है। वहीं पुराने समय में मिट्टी के दीपक को ज्यादा तरजीह दी जाती थी। कुम्हार लोगों के घरों में मिट्टी के दीपक पहुंचाते थे। उसके बदले लोग उन्हें पैसे, अनाज देकर खुश करते थे। आधुनिकता के दौर में यह सब खत्म हो गया है।
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आधुनिक समय में दिवाली पर कपड़ों की खरीदारी को महत्व नहीं दिया जाता है। पुराने समय में बच्चों के लिए विशेष तौर पर नए कपड़े खरीदे जाते थे, जिसे दिवाली के दिन बच्चे पहनकर बहुत खुश नजर आते थे, लेकिन ऐसा चलन भी अब खत्म हो गया है।
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इस जमाने में दिवाली का त्यौहार खानापूर्ति बनकर रह गया है। त्योहार को लेकर जो भी मान्यता होती है वह परंपरा अनुसार नहीं हो पा रही है। इसके चलते यह दिवाली का त्योहार भी आम दिनों की तरह ही लगती हैं। हमें अपने परंपरागत तरीके से पर्वों को मनाना होगा।
-कौशल्या देवी, पंचायत कार्थोली
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पहले जमाने में लोग इकट्ठे होकर दिवाली पर खेत खलिहान जानवर इत्यादि के लिए सुख समृद्धि और मंगल कामना मांगते थे। बड़ी सहजता के साथ त्योहार का आगमन करते थे, लेकिन आधुनिक जमाने में ऐसा बिल्कुल भी नहीं हो रहा है। युवा पीढ़ी परंपरागत त्योहार से विमुख हो रही है।
-विशंभर शर्मा
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दिवाली का त्योहार सुख समृद्धि और भाग्य साथ लेकर आता है। त्योहार पर लोग अवगुण छोड़कर सद्गुण पैदा करते थे, लेकिन जितनी तेजी से जमाने ने रफ्तार पकड़ी है, लोगों ने भी अपने आपको उसी सांचे में ढाल लिया है, जिसको लेकर हम अपनी धरोहर खोते जा रहे हैं। पहले जमाने में लोग दीवाली बड़ी पवित्रता और समानता के साथ मनाते थे जो विलुप्त होता जा रहा है
-ओमकार सैनी, बाड़ी ब्राह्मणा
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आधुनिक समय में दिवाली की बधाई मोबाइल के जरिये दी जाने लगी है। ज्यादा से ज्यादा वीडियो कॉल कर पर्व की खुशियों को एक दूसरे के साथ साझा किया जाता है। दूसरी ओर पुराने समय में दिवाली के त्योहार पर अपने से दूर सगे संबंधियों को चिट्ठी भेजकर बधाई संदेश भेजे जाते थे। या दिवाली पर अपनों के साथ खुशियां साझा करने के लिए लोग घर आ जाते थे। परिवार के साथ दिवाली की खुशियां मनाते थे। ज्यादातर लोगों की यही कोशिश होती कि दिवाली का त्योहार अपने घर के सदस्यों के बीच मनाया जाए।
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आधुनिकता के दौर में दिवाली पर ज्यादातर लोग खानपान के लिए होटल और रेस्टोरेंट में जाते हैं। या पैकिंग खाना बाहर से मंगवाया जाता है। मिठाइ के डिब्बे भी बाजार से खरीद कर एक दूसरे को भेजे जाते हैं, लेकिन पूर्व में खानपान, मिठाई, पकवान घर में ही बनाता जाता था। परिवार के सभी सदस्य इकट्ठे खाना खाते थे। बर्फी जलेबी और अन्य प्रकार के मिष्ठान घरों में ही तैयार किए जाते थे। आस पड़ोस में मिठाई बांटकर लोग खुशियों का इजहार करते थे। एक दूसरे को बधाइयां देते थे। गांव में ज्यादातर राजमा चावल पूरियां और सुच्चियां मुख्य खाना बनाया जाता था।
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बदल गए बच्चों के खिलौने
आधुनिक दिवाली में बच्चों के खिलौने भी बदल गए हैं। पूर्व में मिट्टी के खिलौने हाथी, घोडे़े, बैलगाड़ी सतेम अनेक प्रकार के खिलौने बच्चों के लिए होते थे। अब बम, पटाखे फोड़े जाते हैं। पुराने समय में बच्चों के लिए घर पर ही लकड़ी के पिस्तौल, रेत के बम और गुब्बारे दिए जाते थे।
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आधुनिक दिवाली में जहां मोमबत्तियां, झालर और लड़ी से घर रोशन किया जाता है। वहीं पुराने समय में मिट्टी के दीपक को ज्यादा तरजीह दी जाती थी। कुम्हार लोगों के घरों में मिट्टी के दीपक पहुंचाते थे। उसके बदले लोग उन्हें पैसे, अनाज देकर खुश करते थे। आधुनिकता के दौर में यह सब खत्म हो गया है।
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आधुनिक समय में दिवाली पर कपड़ों की खरीदारी को महत्व नहीं दिया जाता है। पुराने समय में बच्चों के लिए विशेष तौर पर नए कपड़े खरीदे जाते थे, जिसे दिवाली के दिन बच्चे पहनकर बहुत खुश नजर आते थे, लेकिन ऐसा चलन भी अब खत्म हो गया है।
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इस जमाने में दिवाली का त्यौहार खानापूर्ति बनकर रह गया है। त्योहार को लेकर जो भी मान्यता होती है वह परंपरा अनुसार नहीं हो पा रही है। इसके चलते यह दिवाली का त्योहार भी आम दिनों की तरह ही लगती हैं। हमें अपने परंपरागत तरीके से पर्वों को मनाना होगा।
-कौशल्या देवी, पंचायत कार्थोली
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पहले जमाने में लोग इकट्ठे होकर दिवाली पर खेत खलिहान जानवर इत्यादि के लिए सुख समृद्धि और मंगल कामना मांगते थे। बड़ी सहजता के साथ त्योहार का आगमन करते थे, लेकिन आधुनिक जमाने में ऐसा बिल्कुल भी नहीं हो रहा है। युवा पीढ़ी परंपरागत त्योहार से विमुख हो रही है।
-विशंभर शर्मा
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दिवाली का त्योहार सुख समृद्धि और भाग्य साथ लेकर आता है। त्योहार पर लोग अवगुण छोड़कर सद्गुण पैदा करते थे, लेकिन जितनी तेजी से जमाने ने रफ्तार पकड़ी है, लोगों ने भी अपने आपको उसी सांचे में ढाल लिया है, जिसको लेकर हम अपनी धरोहर खोते जा रहे हैं। पहले जमाने में लोग दीवाली बड़ी पवित्रता और समानता के साथ मनाते थे जो विलुप्त होता जा रहा है
-ओमकार सैनी, बाड़ी ब्राह्मणा