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अध्यात्म, भक्ति, धर्म साधना जरूरी : स्वामी हरिदासानंद
Tue, 27 May 2025 01:30 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू
संवाद न्यूज एजेंसी, जम्मू
Updated Tue, 27 May 2025 01:30 AM IST
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नौशेरा। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से सोमवार को मरचोला, सुंदरबनी में एक दिवसीय सत्संग किया गया। इनमें गुरुदेव आशुतोष महाराज के शिष्य स्वामी हरिदासानंद ने कहा कि अध्यात्म, भक्ति, धर्म, साधना विशाल पंख हैं, यह विराटता के क्षितिज में हमें उड़ान भरवाते हैं।
स्वामी हरिदासानंद ने स्वामी विवेकानंद, योगानंद, रामतीर्थ, मीराबाई, संत कबीर, दयानंद सरस्वती, गुरु साहिबान का योगदान भी बताया।
उन्होंने कहा कि धर्म के मर्म को न जानने वाले कुछ स्वार्थी लोगों ने ही इन गरिमामय शब्दों की संकीर्ण व्याख्या की है। धर्म कतई यह नहीं कहता कि अगर आपने साधना का संकल्प लिया है, तो आप समाज में फैली कुरीतियों को अनदेखा करें।
निष्क्रिय होकर जो हो रहा है, उसके मात्र मूकदर्शक नहीं बना जा सकता। इसलिए समाज के प्रति अपने सब कर्तव्यों को त्यागकर, आसपास व्याप्त विकृतियों को दूर करने का प्रयास अवश्य करें।
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यदि ऐसा होता तो समर्थ श्री गुरु रामदास कभी भी मुगलों के विरुद्ध छत्रपति शिवाजी की मदद न करते। माधोदास भी श्री गुरु गोबिंद सिंह के साथ न जाते। श्री कृष्ण भी अर्जुन को गीता का उपदेश न देते।
यदि अध्यात्म का लक्ष्य सामाजिक कर्तव्यों से भाग जाने वाले कायरों की कतार लगाना होता, तो फिर न तो अखंड भारत का निर्माण करने वाले आचार्य चाणक्य होते और न ही भारतीय संस्कृति का परचम विदेशी भूमि पर लहराने वाले स्वामी विवेकानंद और योगानंद।
यह देश स्वामी रामतीर्थ, भक्तिमती मीराबाई, संत कबीर, स्वामी दयानंद सरस्वती, भक्त नामदेव, संत ज्ञानेश्वर, गुरु साहिबान आदि असंख्य संत-सेनानियों की गौरव गाथा का साक्षी रहा है। इन महापुरुषों ने यही सिद्ध किया कि अध्यात्म व्यक्ति को भीरू नहीं, अपितु सच्चा कर्मयोगी बनाता है।
ऐसा सक्रिय कर्मयोगी, जो सुदूर शिखरों पर जाकर आंखें नहीं मूंदता बल्कि समाज में रहकर जागृति की ऐसी मशाल जलाता है जो बुराइयों के घनघोर तमस का भेदन कर देती है। उसके लिए सच्ची आध्यात्मिकता को हृदय में धारण कर लेना और धर्म की वास्तविक परिभाषा को जान लेना जरूरी है।
गुरुदेव आशुतोष महाराज के हवाले से उन्होंने कहा कि धर्म के चिह्नों को धारण करने से धार्मिक नहीं बना जाता, अपितु गुरु-कृपा से ईश्वर के तत्त्व-रूप का दर्शन कर सवृत्तियों को धारण करने से धार्मिक बना जाता है।
पापी लोगों का नाश करना भी परोपकार है। कार्यक्रम के दौरान महात्मा गुरप्रीत और महात्मा सुनील आदि ने भजन सुनाए। सत्संग समापन के बाद सभी संगत ने लंगर ग्रहण किया।
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स्वामी हरिदासानंद ने स्वामी विवेकानंद, योगानंद, रामतीर्थ, मीराबाई, संत कबीर, दयानंद सरस्वती, गुरु साहिबान का योगदान भी बताया।
उन्होंने कहा कि धर्म के मर्म को न जानने वाले कुछ स्वार्थी लोगों ने ही इन गरिमामय शब्दों की संकीर्ण व्याख्या की है। धर्म कतई यह नहीं कहता कि अगर आपने साधना का संकल्प लिया है, तो आप समाज में फैली कुरीतियों को अनदेखा करें।
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निष्क्रिय होकर जो हो रहा है, उसके मात्र मूकदर्शक नहीं बना जा सकता। इसलिए समाज के प्रति अपने सब कर्तव्यों को त्यागकर, आसपास व्याप्त विकृतियों को दूर करने का प्रयास अवश्य करें।
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यदि ऐसा होता तो समर्थ श्री गुरु रामदास कभी भी मुगलों के विरुद्ध छत्रपति शिवाजी की मदद न करते। माधोदास भी श्री गुरु गोबिंद सिंह के साथ न जाते। श्री कृष्ण भी अर्जुन को गीता का उपदेश न देते।
यदि अध्यात्म का लक्ष्य सामाजिक कर्तव्यों से भाग जाने वाले कायरों की कतार लगाना होता, तो फिर न तो अखंड भारत का निर्माण करने वाले आचार्य चाणक्य होते और न ही भारतीय संस्कृति का परचम विदेशी भूमि पर लहराने वाले स्वामी विवेकानंद और योगानंद।
यह देश स्वामी रामतीर्थ, भक्तिमती मीराबाई, संत कबीर, स्वामी दयानंद सरस्वती, भक्त नामदेव, संत ज्ञानेश्वर, गुरु साहिबान आदि असंख्य संत-सेनानियों की गौरव गाथा का साक्षी रहा है। इन महापुरुषों ने यही सिद्ध किया कि अध्यात्म व्यक्ति को भीरू नहीं, अपितु सच्चा कर्मयोगी बनाता है।
ऐसा सक्रिय कर्मयोगी, जो सुदूर शिखरों पर जाकर आंखें नहीं मूंदता बल्कि समाज में रहकर जागृति की ऐसी मशाल जलाता है जो बुराइयों के घनघोर तमस का भेदन कर देती है। उसके लिए सच्ची आध्यात्मिकता को हृदय में धारण कर लेना और धर्म की वास्तविक परिभाषा को जान लेना जरूरी है।
गुरुदेव आशुतोष महाराज के हवाले से उन्होंने कहा कि धर्म के चिह्नों को धारण करने से धार्मिक नहीं बना जाता, अपितु गुरु-कृपा से ईश्वर के तत्त्व-रूप का दर्शन कर सवृत्तियों को धारण करने से धार्मिक बना जाता है।
पापी लोगों का नाश करना भी परोपकार है। कार्यक्रम के दौरान महात्मा गुरप्रीत और महात्मा सुनील आदि ने भजन सुनाए। सत्संग समापन के बाद सभी संगत ने लंगर ग्रहण किया।