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प्रदूषण नहीं, खुशियां बांटने का त्योहार है दिवाली
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जम्मू। दिवाली खुशियों का त्योहार है। आधुनिक समाज में पटाखे चलाने की परंपरा शुरू हुई है। कोरोना महामारी के बीच इस बार दिवाली में बुजुर्गों ने भी ग्रीन दिवाली मनाने का प्रण लिया है। पटाखे चलाने से निकलने वाले धुएं से सांस संबंधी बीमारियां बढ़ती हैं। पटाखों का धुआं हर उम्र के लोगों की सेहत पर बुरा असर डालता है, जो कोरोना महामारी के बीच और भी घातक साबित हो सकता है। बुजुर्गों का मानना है कि पहले दिवाली पर घी के दिए और मिठाई बांटी जाती थी, लेकिन 90 के दशक के बाद जैसे ही नए कारखाने लगाने का दौर बढ़ा तो दिवाली पर पटाखे चलाने का भी रिवाज बढ़ गया। पटाखे चलाने से भगवान को खुश नहीं किया जा सकता। इससे वातावरण प्रदूषित होता है।
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1990 के दशक से पहले लोग घी के दीये जलाकर दिवाली मनाते थे, लेकिन जैसे ही लोगों के पास धन-दौलत बढ़ने लगी तो पटाखों का दौर भी बढ़ गया। इस बार की दिवाली सबसे अलग होगी, हम बिना पटाखों के दिवाली मनाएंगे। घर पर दीये और भगवान श्रीराम की पूजा करके दिवाली मनाई जाएगी। बच्चों को पटाखों से फैलने वाले प्रदूषण के परिणाम के बारे में जागरूक करेंगे। बच्चों को समझाएंगे की इस बार पटाखे न चलाएं।
- राजिंद्र गुप्ता, बुजुर्ग, जम्मू
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हम इस बार पटाखों से नहीं घर पर रहकर दियों की रोशनी से दिवाली मनाएंगे। बच्चों को समझाया गया है कि वे कोरोना महामारी के बीच पटाखे नहीं चलाएं। पहले समय में लोग घी के दिए जलाकर और मिठाई बांटकर दिवाली की खुशियां बांटते थे, लेकिन इस दौर में दिवाली मनाने का तरीका काफी हद तक बदल गया है। कई बुजुर्ग तो पहले से ही बीमारियों से ग्रस्त होते हैं, लेकिन पटाखे चलाने से उनकी जान को और खतरा बढ़ जाता है।
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- शाम लाल, बुजुर्ग, जम्मू
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-पटाखों से मुझे एलर्जी होती है, दिवाली के दिन पड़ोस से पटाखों की आवाज से मैं दरवाजा बंद कर देती हूं। पटाखे चलाने से हवा में कैल्शियम, गंधक, एल्युमीनियम और बेरियम आदि के अंश हमारे शरीर में चले जाते हैं, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ने का डर रहता है। कई बुजुर्ग तो पटाखों की ध्वनि से दम तोड़ देते हैं। मैं बच्चों को सलाह दूंगी कि, इस बार दीये और रोशनी से पुराने तरीके से दिवाली मनाएं।
- प्रवेश महाजन, जम्मू
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- पटाखों से सबसे ज्यादा नुकसान उन बुजुर्गों को होता है, जो एक तरफ बुढ़ापे की मार झेल रहे होते हैं तो दूसरी तरफ तमाम बीमारियों से घिरे होते हैं। इससे सांस फूलने, घबराहट, खांसी, हृदय संबधी दिक्कतें, आंखों में संक्रमण, दमा का अटैक, गले में संक्रमण आदि के खतरे होते हैं। ध्वनि प्रदूषण से बुजुर्गों की जान भी जा सकती है। मैं अपने परिवार के साथ इस बार पटाखे रहित दिवाली मनाऊंगा। लोगों को भी सलाह दूंगा कि पटाखे चलाना हमारी सेहत के लिए जानलेवा हैं।
- मदन लाल, जम्मू
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- सभी दिवाली से पहले कहते हैं कि हम पटाखे नहीं चलाएंगे, लेकिन दिवाली आते ही लोग झोला लेकर पटाखों के लिए निकल पढ़ते हैं, जो गलत बात है। पटाखे चलाना बुजुर्गों की जान को न्योता देना है। बहुत सारे बुजुर्ग पटाखों से निकलने वाले धुएं से बीमारियों का शिकार हो जाते हैं, जान जाने का भी खतरा होता है। हम इस बार पुराने रीति-रिवाज से दिवाली मनाएंगे और लोगों को भी सलाह देंगे कि कोरोना काल में इस बार दिवाली को पटाखों के बगैर ही मनाएं।
- सुरम सिंह, बुजुर्ग, जम्मू
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1990 के दशक से पहले लोग घी के दीये जलाकर दिवाली मनाते थे, लेकिन जैसे ही लोगों के पास धन-दौलत बढ़ने लगी तो पटाखों का दौर भी बढ़ गया। इस बार की दिवाली सबसे अलग होगी, हम बिना पटाखों के दिवाली मनाएंगे। घर पर दीये और भगवान श्रीराम की पूजा करके दिवाली मनाई जाएगी। बच्चों को पटाखों से फैलने वाले प्रदूषण के परिणाम के बारे में जागरूक करेंगे। बच्चों को समझाएंगे की इस बार पटाखे न चलाएं।
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- राजिंद्र गुप्ता, बुजुर्ग, जम्मू
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हम इस बार पटाखों से नहीं घर पर रहकर दियों की रोशनी से दिवाली मनाएंगे। बच्चों को समझाया गया है कि वे कोरोना महामारी के बीच पटाखे नहीं चलाएं। पहले समय में लोग घी के दिए जलाकर और मिठाई बांटकर दिवाली की खुशियां बांटते थे, लेकिन इस दौर में दिवाली मनाने का तरीका काफी हद तक बदल गया है। कई बुजुर्ग तो पहले से ही बीमारियों से ग्रस्त होते हैं, लेकिन पटाखे चलाने से उनकी जान को और खतरा बढ़ जाता है।
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- शाम लाल, बुजुर्ग, जम्मू
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-पटाखों से मुझे एलर्जी होती है, दिवाली के दिन पड़ोस से पटाखों की आवाज से मैं दरवाजा बंद कर देती हूं। पटाखे चलाने से हवा में कैल्शियम, गंधक, एल्युमीनियम और बेरियम आदि के अंश हमारे शरीर में चले जाते हैं, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ने का डर रहता है। कई बुजुर्ग तो पटाखों की ध्वनि से दम तोड़ देते हैं। मैं बच्चों को सलाह दूंगी कि, इस बार दीये और रोशनी से पुराने तरीके से दिवाली मनाएं।
- प्रवेश महाजन, जम्मू
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- पटाखों से सबसे ज्यादा नुकसान उन बुजुर्गों को होता है, जो एक तरफ बुढ़ापे की मार झेल रहे होते हैं तो दूसरी तरफ तमाम बीमारियों से घिरे होते हैं। इससे सांस फूलने, घबराहट, खांसी, हृदय संबधी दिक्कतें, आंखों में संक्रमण, दमा का अटैक, गले में संक्रमण आदि के खतरे होते हैं। ध्वनि प्रदूषण से बुजुर्गों की जान भी जा सकती है। मैं अपने परिवार के साथ इस बार पटाखे रहित दिवाली मनाऊंगा। लोगों को भी सलाह दूंगा कि पटाखे चलाना हमारी सेहत के लिए जानलेवा हैं।
- मदन लाल, जम्मू
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- सभी दिवाली से पहले कहते हैं कि हम पटाखे नहीं चलाएंगे, लेकिन दिवाली आते ही लोग झोला लेकर पटाखों के लिए निकल पढ़ते हैं, जो गलत बात है। पटाखे चलाना बुजुर्गों की जान को न्योता देना है। बहुत सारे बुजुर्ग पटाखों से निकलने वाले धुएं से बीमारियों का शिकार हो जाते हैं, जान जाने का भी खतरा होता है। हम इस बार पुराने रीति-रिवाज से दिवाली मनाएंगे और लोगों को भी सलाह देंगे कि कोरोना काल में इस बार दिवाली को पटाखों के बगैर ही मनाएं।
- सुरम सिंह, बुजुर्ग, जम्मू