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न्यायालय ने कहा: प्रोबेशन के दौरान कर्मचारी का तबादला कर सकती है सरकार, आईआरपी जवानों की याचिका खारिज

Mon, 22 Nov 2021 10:13 PM IST
प्रशांत कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, श्रीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, श्रीनगर Published by: प्रशांत कुमार Updated Mon, 22 Nov 2021 10:13 PM IST
सार

न्यायमूर्ति अली मोहम्मद माग्रे और न्यायमूर्ति संजय धर की खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि एकल न्यायाधीश के 19 फरवरी 2020 के फैसले में अदालत को कोई खोट नजर नहीं आता जिसमें उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की जरूरत हो। 
 

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Court said Government can transfer employees during probation, dismisses petition of IRP jawans
jammu court - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने परिवीक्षा के दौरान भी किसी कर्मचारी को स्थानांतरित करने की सरकार की शक्ति को बरकरार रखा है। इसके साथ ही इंडियन रिजर्व पुलिस (आईआरपी) के पांच जवानों द्वारा अपने तबादले के खिलाफ दाखिल याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया। इन जवानों का तर्क था कि परिवीक्षा (प्रोबेशन) अवधि के दौरान उनका तबादला नहीं किया जा सकता। 

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सरकार ने आईआरपी की 22वीं और 15वीं बटालियन के पांच जवानों को 2019 में जम्मू से कश्मीर घाटी स्थानांतरित कर दिया था। इन जवानों ने इसके खिलाफ अदालत में याचिका दाखिल की थी कि वह अभी परिवीक्षा अवधि में हैं। साथ ही उन्होंने तर्क दिया था कि उन्हें जम्मू और कश्मीर विशेष भर्ती नियम 2015 के तहत नियुक्त किया गया है और उन्हें एसआरओ 202 के तहत पांच साल की परिवीक्षा अवधि के दौरान स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है। वर्ष 2015 के नियमों के उप नियम 8 (2) का हवाला देते हुए, उन्होंने तर्क दिया था कि एक नियुक्त व्यक्ति को उस पद पर पांच साल की अवधि के लिए आवश्यक रूप से काम करना होगा, जिस पर उसे नियुक्त किया गया है और ऐसे नियुक्ति व्यक्ति को पांच साल की अस्थायी सेवा के दौरान किसी भी कारण से स्थानांतरण के लिए।
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हालांकि अदालत की एकल पीठ ने 19 फरवरी 2020 को इस तर्क से असहमति जताते हुए याचिका को खारिज कर दिया था। एकल पीठ का कहना था कि सरकार को 2015 के नियमों के तहत नियुक्त व्यक्ति को प्रारंभिक सेवा/परिवीक्षा अवधि के पांच वर्ष पूरे होने से पहले स्थानांतरण का आदेश पारित करने के लिए किसी भी तरह से रोक नहीं है। एकल पीठ की राय थी कि 2015 के नियमों के नियम 8 (2) वास्तव में सेवा के पहले पांच वर्षों के भीतर, यानी परिवीक्षा अवधि के दौरान स्थानांतरण की मांग नहीं करने के लिए नियुक्ति पर प्रतिबंध लगाता है।

दो सदस्यीय खंडपीठ ने कहा, हमारा विचार है कि एकल न्यायाधीश द्वारा पारित निर्णय न केवल स्पष्ट है, बल्कि इस विषय को नियंत्रित करने वाले नियमों / कानून के अनुरूप भी है। अदालत ने कहा कि 2015 के इन नियमों में प्रदान किए गए नियम के किसी भी प्रावधान की व्याख्या जम्मू-कश्मीर सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1956 के जनादेश के साथ अलगाव या विरोध में नहीं की जा सकती है, लेकिन 1956 के नियमों के दायरे के साथ संयुक्त रूप से इसका अर्थ लगाया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि यहां यह स्पष्ट करना उचित है कि 1956 के नियम 27 के नियम स्पष्ट रूप से सरकार को एक कर्मचारी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश में जन्म के पद पर स्थानांतरित करने का अधिकार देते हैं।

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