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निलंबन कोई सजा नहीं, यह जांच की एक मात्र प्रक्रिया : कैट
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- पशु पालन विभाग कश्मीर के अधिकारी की निलंबन हटाने की याचिका को अदालत ने किया खारिज
जम्मू। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) का मानना है कि निलंबन कोई सजा नहीं है। यह न तो दंडात्मक और न ही कलंकात्मक है। यह आम तौर पर निष्पक्ष जांच के लिए किया जाता है। निलंबन आदेश में हस्तक्षेप करना वो भी तब जब आरोप पत्र भी जारी किया गया है, का मतलब प्रतिवादियों को कानून के अनुसार आगे बढ़ने के अपने दायित्व का निर्वहन करने से रोकना होगा।
इस दलील के साथ डाॅ. विकास गुप्ता की निलंबन हटाने की याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया, जिन्हें 18 अप्रैल को पशु पालन विभाग कश्मीर में कार्यरत रहते निलंबित किया गया था। विकास गुप्ता ने अपने निलंबन के आदेश को सीएटी अदालत में चुनौती दी थी। अदालत के सदस्य राजिंदर सिंह डोगरा ने बुधवार को याचिका पर सुनवाई की। दोनों तरफ की दलीलें सुनने के बाद उन्होंने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में निलंबन आदेशों में अदालतों द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जाता है, सिवाय इसके कि जब इसे किसी अक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित किया गया हो या यह प्रासंगिक नियमों का उल्लंघन हो। वर्तमान मामले में फाइल और आरोप पत्र को देखने से पता चलता है कि आवेदक के खिलाफ सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आवेदक का मामला यह नहीं है कि निलंबन आदेश किसी अक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित किया गया है या कानून का उल्लंघन करते हुए पारित किया गया है। आवेदक द्वारा दिया गया मुख्य तर्क यह है कि आक्षेपित निलंबन आदेश प्रकृति में प्रतिशोधात्मक है क्योंकि यह आवेदक के खिलाफ बदला लेने के लिए जारी किया गया है। जेएनएफ
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जम्मू। केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) का मानना है कि निलंबन कोई सजा नहीं है। यह न तो दंडात्मक और न ही कलंकात्मक है। यह आम तौर पर निष्पक्ष जांच के लिए किया जाता है। निलंबन आदेश में हस्तक्षेप करना वो भी तब जब आरोप पत्र भी जारी किया गया है, का मतलब प्रतिवादियों को कानून के अनुसार आगे बढ़ने के अपने दायित्व का निर्वहन करने से रोकना होगा।
इस दलील के साथ डाॅ. विकास गुप्ता की निलंबन हटाने की याचिका को अदालत ने खारिज कर दिया, जिन्हें 18 अप्रैल को पशु पालन विभाग कश्मीर में कार्यरत रहते निलंबित किया गया था। विकास गुप्ता ने अपने निलंबन के आदेश को सीएटी अदालत में चुनौती दी थी। अदालत के सदस्य राजिंदर सिंह डोगरा ने बुधवार को याचिका पर सुनवाई की। दोनों तरफ की दलीलें सुनने के बाद उन्होंने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में निलंबन आदेशों में अदालतों द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जाता है, सिवाय इसके कि जब इसे किसी अक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित किया गया हो या यह प्रासंगिक नियमों का उल्लंघन हो। वर्तमान मामले में फाइल और आरोप पत्र को देखने से पता चलता है कि आवेदक के खिलाफ सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आवेदक का मामला यह नहीं है कि निलंबन आदेश किसी अक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित किया गया है या कानून का उल्लंघन करते हुए पारित किया गया है। आवेदक द्वारा दिया गया मुख्य तर्क यह है कि आक्षेपित निलंबन आदेश प्रकृति में प्रतिशोधात्मक है क्योंकि यह आवेदक के खिलाफ बदला लेने के लिए जारी किया गया है। जेएनएफ
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