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हाईकोर्ट ने मांगी सरकारी बंगलों पर कब्जे की सूची
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जम्मू। हाईकोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में सरकारी बंगलों पर कब्जे की रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश धीरज सिंह ठाकुर और मोहम्मद अकरम चौधरी वाली खंडपीठ ने यह आदेश दिया है। हाईकोर्ट ने प्रदेश प्रशासन के सरकारी वकील असीम साहनी को उन राजनेताओं/पूर्व विधायकों का विवरण देने के निर्देश दिए हैं, जिन्होंने सरकारी आवास पर कब्जा किया है। कहा कि ऐसे लोगों को नाम बताएं, जिनके जम्मू में अपने घर होते हुए भी वे सरकारी आवास लेकर बैठे हैं, न सिर्फ जम्मू में, बल्कि श्रीनगर में भी।
उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी कि 2018 के बाद से ये लोग सरकारी आवासों में जबरन रह रहे हैं, जबकि इस्टेट विभाग इनसे आवास खाली कराने में असफल रहा है। एडवोकेट शकील अहमद ने कहा जम्मू जिले में रहने वाले पूर्व विधायक और मंत्रियों ने अपने घर होते हुए भी शहर में सरकारी आवास ले रखे हैं, जिसका कोई मतलब नहीं। इस पर खंडपीठ ने कहा कि अगली सुनवाई पर ऐसे पूर्व विधायकों और मंत्रियों की जानकारी दें। सरकारी वकील ने कहा कि कोई भी मंत्री/नौकरशाह पद छोड़ने के बाद आम नागरिक के बराबर है। हालांकि पद पर रहने के कारण, वे सुरक्षा और अन्य प्रोटोकॉल के हकदार हो सकते हैं, लेकिन जीवन भर के लिए सरकारी बंगले का आवंटन और इसकी निरंतरता समानता के संवैधानिक सिद्धांतों द्वारा निर्देशित नहीं है। हालांकि सरकारी वकील ने बताया कि 72 लोग हैं, जिनकी जान को खतरा होने के चलते उनको सुरक्षा और आवास दिए गए हैं। इनके नाम सबके सामने नहीं लाए जा सके। इस पर उच्च न्यायालय ने कहा है कि वह एक सील बंद लिफाफे में इनकी जानकारी दें।
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उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी कि 2018 के बाद से ये लोग सरकारी आवासों में जबरन रह रहे हैं, जबकि इस्टेट विभाग इनसे आवास खाली कराने में असफल रहा है। एडवोकेट शकील अहमद ने कहा जम्मू जिले में रहने वाले पूर्व विधायक और मंत्रियों ने अपने घर होते हुए भी शहर में सरकारी आवास ले रखे हैं, जिसका कोई मतलब नहीं। इस पर खंडपीठ ने कहा कि अगली सुनवाई पर ऐसे पूर्व विधायकों और मंत्रियों की जानकारी दें। सरकारी वकील ने कहा कि कोई भी मंत्री/नौकरशाह पद छोड़ने के बाद आम नागरिक के बराबर है। हालांकि पद पर रहने के कारण, वे सुरक्षा और अन्य प्रोटोकॉल के हकदार हो सकते हैं, लेकिन जीवन भर के लिए सरकारी बंगले का आवंटन और इसकी निरंतरता समानता के संवैधानिक सिद्धांतों द्वारा निर्देशित नहीं है। हालांकि सरकारी वकील ने बताया कि 72 लोग हैं, जिनकी जान को खतरा होने के चलते उनको सुरक्षा और आवास दिए गए हैं। इनके नाम सबके सामने नहीं लाए जा सके। इस पर उच्च न्यायालय ने कहा है कि वह एक सील बंद लिफाफे में इनकी जानकारी दें।
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