{"_id":"56ea4f2a4f1c1bc5018b4581","slug":"court-gave-order-on-term-restoration","type":"story","status":"publish","title_hn":"आपराधिक केस से बरी होना बहाली का आधार नहीं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आपराधिक केस से बरी होना बहाली का आधार नहीं
जेएनएफ/जम्मू
Updated Thu, 17 Mar 2016 12:01 PM IST
विज्ञापन
कोर्ट
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हाईकोर्ट ने एक रिट याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि आपराधिक केस से बरी होना बहाली का आधार नहीं हो सकता। यह आदेश अदालत ने सेंट्रल बैंक आफ इंडिया की ओर से दायर एक एलपीए की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें बैंक कर्मचारी को बर्खास्त करने के रिट कोर्ट के आदेश को खारिज करने की अपील की गई थी।
विज्ञापन
उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एन पाल वसंथाकुमार और न्यायाधीश बंसी लाल भट की खंडपीठ ने पाया कि मुलाजिम भरोसे और विश्वास के पद पर तैनात था। उसने पद का दुरुपयोग करते हुए भरोसा तोड़ने का कृत्य किया।
विज्ञापन
उसे नौकरी पर फिर से बहाल किया जाना अन्य कर्मियों के लिए शर्मनाक और नियोक्ता के लिए असुविधाजनक होगा। आरोपी बैंक में काम करता था, जहां जनता के पैसे की डीलिंग होती है। उसने ऐसा कृत्य कर बैंक का विश्वास तोड़ा।
विज्ञापन
अदालत ने पाया कि विभागीय जांच के दौरान उसे अपना पक्ष रखने के कई अवसर दिए, लेकिन आरोपी जांच अधिकारी के समक्ष उसे रखने में असफल रहा और अवसरों का लाभ नहीं उठा सका। अदालत ने कहा कि याची यह नहीं कह सकता कि उसे पक्ष रखने का अवसर प्रदान नहीं किया गया।
उसके पक्ष में सिर्फ एक बात है कि उसे आपराधिक केस से बरी कर दिया गया। खंडपीठ ने कहा कि यदि निलंबन अवधि के दौरान याची को कोई जीवन निर्वाह का खर्च नहीं दिया हो तो उसे आठ सप्ताह के अंदर अदा किया जाए।