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राजभवन में ठोस निर्माण पर लगी रोक
जेएनएफ/जम्मू
Updated Sat, 26 Mar 2016 10:11 AM IST
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कोर्ट
- फोटो : demo
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हरी तारा चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा अपने ट्रस्टी डॉ. करण सिंह (पुत्र महाराजा हरी सिंह) के मार्फत राजभवन खाली करने के लिए दायर एक केस पर सुनवाई करते हुए जम्मू के प्रधान सत्र न्यायाधीश आरएस जैन ने मुख्य सचिव और पीडब्ल्यूडी सचिव को 12 मई तक जवाब देने को कहा है।
सुनवाई के दौरान जज ने पाया कि उक्त परिसर को रियासत के राज्यपाल के आधिकारिक निवास राजभवन के रूप में उपयोग किया जाता है। परिसर को उसके पुराने रूप में ही बनाए रखने के लिए अदालत ने मुख्य सचिव और पीडब्ल्यूडी सचिव को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिए कि केस के निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वहां किसी तरह का ठोस निर्माण न किया जाए।
याची के वकील ने बताया कि डा. करण सिंह की पत्नी महारानी याशोराज लक्ष्मी उक्त संपत्ति की मालिक है। 126 कनाल में फैसे उक्त परिसर में ‘रणबीर महल‘ और ‘करण निवास’ भी है। इसके अलावा सर्वेंट क्वार्टर, लान, बगीचा, पेड़, आदि हैं।
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उक्त जमीन लीज पर ली गई थी, जिसकी अवधि एक मई 1967 को समाप्त हो गई। उसके बाद आपसी राय से उसे चार हजार रुपये प्रति माह किराए पर दिया गया। 1979 में महारानी और डा. करण सिंह ने एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट बनाकर उक्त संपत्ति उसमें दान कर दी।
याची ने कई बार सरकार से आग्रह किया कि राजभवन को किसी अन्य स्थान में शिफ्ट कर इस परिसर को खाली कर दिया जाए। लेकिन प्रतिवादी ने आज तक ऐसा नहीं किया। याची ने अदालत से आग्रह किया कि संपत्ति के खाली हिस्से को ट्रस्ट के हवाले किया जाए और गैरकानूनी तरीके से उसके उपयोग के लिए 1,63,68,000 रुपये मुआवजा भी दे। साथ ही भविष्य में रोजाना 50 हजार रुपये किराया दिया जाए।
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सुनवाई के दौरान जज ने पाया कि उक्त परिसर को रियासत के राज्यपाल के आधिकारिक निवास राजभवन के रूप में उपयोग किया जाता है। परिसर को उसके पुराने रूप में ही बनाए रखने के लिए अदालत ने मुख्य सचिव और पीडब्ल्यूडी सचिव को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिए कि केस के निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले वहां किसी तरह का ठोस निर्माण न किया जाए।
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याची के वकील ने बताया कि डा. करण सिंह की पत्नी महारानी याशोराज लक्ष्मी उक्त संपत्ति की मालिक है। 126 कनाल में फैसे उक्त परिसर में ‘रणबीर महल‘ और ‘करण निवास’ भी है। इसके अलावा सर्वेंट क्वार्टर, लान, बगीचा, पेड़, आदि हैं।
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उक्त जमीन लीज पर ली गई थी, जिसकी अवधि एक मई 1967 को समाप्त हो गई। उसके बाद आपसी राय से उसे चार हजार रुपये प्रति माह किराए पर दिया गया। 1979 में महारानी और डा. करण सिंह ने एक पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट बनाकर उक्त संपत्ति उसमें दान कर दी।
याची ने कई बार सरकार से आग्रह किया कि राजभवन को किसी अन्य स्थान में शिफ्ट कर इस परिसर को खाली कर दिया जाए। लेकिन प्रतिवादी ने आज तक ऐसा नहीं किया। याची ने अदालत से आग्रह किया कि संपत्ति के खाली हिस्से को ट्रस्ट के हवाले किया जाए और गैरकानूनी तरीके से उसके उपयोग के लिए 1,63,68,000 रुपये मुआवजा भी दे। साथ ही भविष्य में रोजाना 50 हजार रुपये किराया दिया जाए।