कश्मीरी राजमा-चावल पर चीन ने जमाया अपना कब्जा
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राजमा-चावल का नाम आते ही खाने-पीने के शौकीनों को तत्काल जम्मू-कश्मीर की याद आती है। यहां का राजमा देश ही नहीं, विदेशों में भी अपनी अलग छाप छोड़ चुका है।
एक समय रियासत पूरे देश को राजमा की सप्लाई करती थी, लेकिन अब यहां के लोगों को भी यहां के राजमा से महरूम होना पड़ रहा है। हालत यह है कि 80 फीसदी चीन और इथोपिया का राजमा देश के साथ जम्मू-कश्मीर में भी घुसपैठ कर चुका है।
जानकारों की माने तो रियासत में पांच फीसदी से भी कम राजमा की पैदावार हो रही है और लोग इसका उपयोग अपने घरों के लिए ही कर रहे हैं। थोड़ा बहुत राजमा बाजार में उपलब्ध है तो उसकी कीमत विदेशी राजमा से काफी ज्यादा है।
कभी पुंछ से बाहर ले जाने पर था प्रतिबंध
ऐसा नहीं है कि जम्मू-कश्मीर के राजमा की मांग नहीं है, लेकिन इसकी घटती पैदावार और इसके संरक्षण के लिए रियासती सरकार ने कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
जम्मू-कश्मीर की सबसे बड़ी अनाज मंडी के दाल व्यापारी कीर्ति गुप्ता कहते हैं कि रियासत के राजमा का अलग ही स्वाद है। सरकार को सेब और केसर की तरह इसके संरक्षण के भी प्रयास करने चाहिए।
अन्यथा जम्मू-कश्मीर के राजमा का नामोनिशान मिट जाएगा। जानकारों के अनुसार पांच साल पहले श्रेष्ठ राजमा 80 रुपये किलो तक में मिल जाता था, लेकिन अब 160-165 रुपये किलो राजमा ढूंढने पर नहीं मिलता।
एक समय पुंछ जिले में सबसे ज्यादा और स्वादिष्ट राजमा की पैदावार होती थी। सरकार ने उस समय राजमा जिले से बाहर भेजने पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन आज वहां राजमा का नामोनिशान मिट चुका है।
इसके अलावा किश्तवाड़, भद्रवाह, पाडर और कश्मीर के अनंतनाग, सोपोर, मढ़वाह क्षेत्रों में राजमा की पैदावार होती है। लेकिन अब किश्तवाड़, चिनाब वैली, भद्रवाह और कश्मीर के कुछ हिस्सों में इसकी खेती हो रही है।