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रुचि नहीं, नीति को दें वरीयता : आचार्य मनोज कृष्ण
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कथा सुनाते आचार्य मनोज कृष्ण
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भगवद प्राप्ति के लिए भी हठ या ज़िद अच्छी नहीं होती, बल्कि मनुष्य को सहज भाव से रहना चाहिए
संवाद न्यूज एजेंसी
कटड़ा। परमार्थ के मार्ग पर हठ नहीं, सहज योग से ही कल्याण संभव है। यह संदेश वृंदावन के आचार्य मनोज कृष्ण जी महाराज ने मंगलवार को श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन साध संगत को दिया। यह कथा कटड़ा कश्मीर रोड स्थित भूमिका मंदिर के पास श्री राजमाता जी आश्रम शनि मंदिर में आयोजित की जा रही है।
श्री राजमाता झंडेवाला मंदिर समूह के प्रबंधक ने जानकारी दी कि स्वामी राजेश्वरानंद महाराज के सान्निध्य में आयोजित इस श्रीमद्भागवत कथा में आचार्य मनोज कृष्णजी महाराज ने आज ध्रुव चरित्र, प्रहलाद चरित्र, एवं राजा बलि और वामनावतार के प्रसंगों पर विस्तार से चर्चा की।
इन्हीं विषयों पर तत्वज्ञान देते हुए, प्रहलाद-हिरण्यकश्यप प्रसंग पर शिक्षा देते हुए आचार्य ने कहा कि किसी भी इच्छा के लिए या भगवद प्राप्ति के लिए भी हठ या ज़िद अच्छी नहीं होती, बल्कि मनुष्य को सहज भाव से रहना चाहिए। उन्होंने समझाया कि अगर ज़िद या हठ करके कुछ प्राप्त कर भी लिया जाए, तो यह निश्चित नहीं है कि वह हमारे लिए सुखदायी ही होगा।
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इसके विपरीत, यदि हम सहज योग के मार्ग पर अग्रसर होते हैं, तो यह तय है कि हमें जो भी प्राप्त होगा, हम उसी में से कोई न कोई खुशी अधिक खोज लेंगे। हिरण्यकश्यप ने हठ योग करके हर तरह से मृत्यु से बचाव के रास्ते मांग लिए थे, लेकिन क्या वह मृत्यु से बच पाया? दूसरी ओर, प्रहलाद सहज स्वभाव से हर हाल में भगवान की रजा मानकर आगे बढ़ता रहा और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सभी कुछ पा लिया।
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संवाद न्यूज एजेंसी
कटड़ा। परमार्थ के मार्ग पर हठ नहीं, सहज योग से ही कल्याण संभव है। यह संदेश वृंदावन के आचार्य मनोज कृष्ण जी महाराज ने मंगलवार को श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन साध संगत को दिया। यह कथा कटड़ा कश्मीर रोड स्थित भूमिका मंदिर के पास श्री राजमाता जी आश्रम शनि मंदिर में आयोजित की जा रही है।
श्री राजमाता झंडेवाला मंदिर समूह के प्रबंधक ने जानकारी दी कि स्वामी राजेश्वरानंद महाराज के सान्निध्य में आयोजित इस श्रीमद्भागवत कथा में आचार्य मनोज कृष्णजी महाराज ने आज ध्रुव चरित्र, प्रहलाद चरित्र, एवं राजा बलि और वामनावतार के प्रसंगों पर विस्तार से चर्चा की।
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इन्हीं विषयों पर तत्वज्ञान देते हुए, प्रहलाद-हिरण्यकश्यप प्रसंग पर शिक्षा देते हुए आचार्य ने कहा कि किसी भी इच्छा के लिए या भगवद प्राप्ति के लिए भी हठ या ज़िद अच्छी नहीं होती, बल्कि मनुष्य को सहज भाव से रहना चाहिए। उन्होंने समझाया कि अगर ज़िद या हठ करके कुछ प्राप्त कर भी लिया जाए, तो यह निश्चित नहीं है कि वह हमारे लिए सुखदायी ही होगा।
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इसके विपरीत, यदि हम सहज योग के मार्ग पर अग्रसर होते हैं, तो यह तय है कि हमें जो भी प्राप्त होगा, हम उसी में से कोई न कोई खुशी अधिक खोज लेंगे। हिरण्यकश्यप ने हठ योग करके हर तरह से मृत्यु से बचाव के रास्ते मांग लिए थे, लेकिन क्या वह मृत्यु से बच पाया? दूसरी ओर, प्रहलाद सहज स्वभाव से हर हाल में भगवान की रजा मानकर आगे बढ़ता रहा और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सभी कुछ पा लिया।