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ग्रामीण क्षेत्र में जांवकार्ड होल्डर मजदूर को नही मिल रहा काम
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आरएस पुरा। ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे लोगों को 100 दिन का रोजगार दिलाने और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए सरकार की तरफ से महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत काम दिलाने व गांव के विकास का सपना भले ही देखा हो, लेकिन मैदानी स्तर पर यह योजना हवा-हवाई ही नजर आ रही है। मनरेगा के तहत कार्य तो निर्धारित किए जाते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में कार्य न के बराबर हो रहे हैं।
बताया जा रहा है कि मनरेगा केवल मैदानी कर्मचारियों द्वारा तैयार किए गए कागजी आंकड़े तक सीमित है। जबकि हकीकत यह है कि मनरेगा के तहत ग्रामीणों को काम 100 दिन का काम नहीं मिल पा रहा है। तो वहीं लक्ष्य के अनुरूप कार्य तो प्रारंभ ही नहीं हुए।
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बिना कार्य ही जारी हो जाता है मस्टर रोल
वीडियो कांफ्रेसिंग और बैठक होने के बाद अधिकारियों के निर्देश पर पंचायत सचिव निर्माण कार्य का एएस-टीएस कराकर मस्टर रोल तो जारी कर लेते हैं, लेकिन काम की शुरूआत नहीं करते हैं। माह भर मस्टर रोल दबाकर रखते हैं और शून्य वर्क पर कोरा मस्टर रोल जमा कर देते हैं। इससे साफ जाहिर है कि प्रशासन के जिम्मेदार उक्त मनरेगा योजना में पात्र लोगों को लाभ नहीं दिला पा रहे हैं।
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इस तरह के होते हैं कार्य
महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत 17 तरह के कार्य निर्धारित किए गए हैं। जिसमें खेल मैदान, सुदूर गांव ,संपर्क सड़क योजना, मुक्तिधाम, आंगनबाड़ी भवन, कपिल धारा कूप योजना, पशु शेड, उद्यानिकी फसलों के रोपण का कार्य सहित मनरेगा के तहत अन्य कार्य किया जाता है।
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काम की गारंटी नहीं
मनरेगा योजना के तहत ऐसे परिवारों को 100 दिन का काम देने की योजना है। जिसके तहत पंजीकृत पात्र लोगों को उक्त योजना से जॉब कार्ड बनाकर उन्हें 100 दिन का काम दिया जाना निर्धारित किया गया है। इसके तहत उपजिले में 20322 परिवार पंजीकृत हैं। जिसमें से महज 3434 परिवार को ही 100 दिन का काम मिला है। इससे साफ जाहिर होता है कि काम की गारंटी नहीं है भले ही सरकार ने 100 दिन के काम दिलाने की बात लगातार कह रही हो।
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214 रुपये दिहाड़ी होने पर आज कौन सा मजदूर काम करेगा। 400 रुपये दिहाड़ी करने के साथ कम से कम 200 दिन काम दिया जाना चाहिए। कोरोना के चलते हर वर्ग परेशान है। सरकार को चाहिए ग्रामीण क्षेत्र में अधिक विकास के लिए मजदूर वर्ग को रोजगार मिले और 500 रुपये दिहाड़ी की जाए, ताकि वह परिवार का खर्च चला सके।
-अंजूरानी, सरपंच, मरालिया पंचायत, -किशोर कुमार, पूर्व सरपंच, राजा सिंह, सरपंच
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हर पंचायत में जॉब कार्ड होल्डर को काम दिया जाता है। अधिकतर मजदूर काम करने के लिए नहीं आते, जिससे दिक्कत पेश आती है।
-अफशां हमल, खंड विकास अधिकारी, मीरां साहिब ब्लॉक
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बताया जा रहा है कि मनरेगा केवल मैदानी कर्मचारियों द्वारा तैयार किए गए कागजी आंकड़े तक सीमित है। जबकि हकीकत यह है कि मनरेगा के तहत ग्रामीणों को काम 100 दिन का काम नहीं मिल पा रहा है। तो वहीं लक्ष्य के अनुरूप कार्य तो प्रारंभ ही नहीं हुए।
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बिना कार्य ही जारी हो जाता है मस्टर रोल
वीडियो कांफ्रेसिंग और बैठक होने के बाद अधिकारियों के निर्देश पर पंचायत सचिव निर्माण कार्य का एएस-टीएस कराकर मस्टर रोल तो जारी कर लेते हैं, लेकिन काम की शुरूआत नहीं करते हैं। माह भर मस्टर रोल दबाकर रखते हैं और शून्य वर्क पर कोरा मस्टर रोल जमा कर देते हैं। इससे साफ जाहिर है कि प्रशासन के जिम्मेदार उक्त मनरेगा योजना में पात्र लोगों को लाभ नहीं दिला पा रहे हैं।
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इस तरह के होते हैं कार्य
महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना के तहत 17 तरह के कार्य निर्धारित किए गए हैं। जिसमें खेल मैदान, सुदूर गांव ,संपर्क सड़क योजना, मुक्तिधाम, आंगनबाड़ी भवन, कपिल धारा कूप योजना, पशु शेड, उद्यानिकी फसलों के रोपण का कार्य सहित मनरेगा के तहत अन्य कार्य किया जाता है।
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काम की गारंटी नहीं
मनरेगा योजना के तहत ऐसे परिवारों को 100 दिन का काम देने की योजना है। जिसके तहत पंजीकृत पात्र लोगों को उक्त योजना से जॉब कार्ड बनाकर उन्हें 100 दिन का काम दिया जाना निर्धारित किया गया है। इसके तहत उपजिले में 20322 परिवार पंजीकृत हैं। जिसमें से महज 3434 परिवार को ही 100 दिन का काम मिला है। इससे साफ जाहिर होता है कि काम की गारंटी नहीं है भले ही सरकार ने 100 दिन के काम दिलाने की बात लगातार कह रही हो।
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214 रुपये दिहाड़ी होने पर आज कौन सा मजदूर काम करेगा। 400 रुपये दिहाड़ी करने के साथ कम से कम 200 दिन काम दिया जाना चाहिए। कोरोना के चलते हर वर्ग परेशान है। सरकार को चाहिए ग्रामीण क्षेत्र में अधिक विकास के लिए मजदूर वर्ग को रोजगार मिले और 500 रुपये दिहाड़ी की जाए, ताकि वह परिवार का खर्च चला सके।
-अंजूरानी, सरपंच, मरालिया पंचायत, -किशोर कुमार, पूर्व सरपंच, राजा सिंह, सरपंच
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हर पंचायत में जॉब कार्ड होल्डर को काम दिया जाता है। अधिकतर मजदूर काम करने के लिए नहीं आते, जिससे दिक्कत पेश आती है।
-अफशां हमल, खंड विकास अधिकारी, मीरां साहिब ब्लॉक