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जम्मू-कश्मीर साल 2018: करवट बदलती रही घाटी की राजनीति, महबूबा सरकार गिरने के बाद आए कई नए मोड़
Wed, 26 Dec 2018 09:47 AM IST
Pranjal Dixit
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
Published by: Pranjal Dixit
Updated Wed, 26 Dec 2018 09:47 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला
जम्मू-कश्मीर के लिए वर्ष 2018 राजनीतिक उथल-पुथल से भरा रहा। ढाई साल पुरानी महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली भाजपा-पीडीपी सरकार गिरी। राज्यपाल शासन के बाद राष्ट्रपति शासन लगा। कई कद्दावर नेताओं के साथ छोड़ने से पीडीपी को गहरा झटका लगा। अलगाववाद से मुख्य धारा में आए पूर्व मंत्री सज्जाद गनी लोन के नेतृत्व वाली पीपुल्स कांफ्रेंस एक नई शक्ति के रूप में उभरती दिखाई दी।
आतंकी धमकियों, अलगाववादियों के बहिष्कार तथा तनाव को ठेंगा दिखाते हुए एक दशक बाद सफल निकाय चुनाव हुए। पंचायत चुनाव के जरिए समाज के अंतिम छोर तक लोकतंत्र पहुंचा।
पूरे साल राज्य में राजनीतिक परिदृश्य में काफी उतार-चढ़ाव रहा। मार्च महीने में महबूबा ने सरकार में वित्त मंत्री रहे डॉ. हसीब द्राबू को पद से बर्खास्त कर दिया। उन्होंने पार्टी लाइन के विपरीत यह कह दिया था कि कश्मीर समस्या को राजनीतिक समस्या के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए।
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30 अप्रैल को तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल किया। कुछ नए मंत्री शामिल किए गए। भाजपा ने अपने कोटे से उप मुख्यमंत्री डॉ. निर्मल सिंह को बदल दिया। उनके स्थान पर कवींद्र गुप्ता को लाया गया। डॉ. सिंह को विधानसभा अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी गई।
रियासत में तेजी से बदले घटनाक्रम के बाद भाजपा ने गठबंधन सरकार से 19 जून को समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद विधानसभा को निलंबित कर दिया गया। छह महीने के राज्यपाल शासन के बाद 19 दिसंबर को राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।
सरकार गिरने के बाद पीडीपी में बगावत की नौबत आ गई। नेताओं ने पार्टी नेतृत्व पर परिवारवाद तथा तानाशाही रवैया अख्तियार करने का आरोप लगाया। पार्टी से पूर्व मंत्री इमरान रजा अंसारी, डॉ. हसीब द्राबू व बशारत बुखारी, पूर्व विधायक आबिद अंसारी, मोहम्मद अब्बास वानी, पीर मोहम्मद हुसैन, यासिर रेशी, सैफुद्दीन भट समेत कुछ अन्य नेताओं ने पार्टी को अलविदा कह दिया। कश्मीर की यह लपट जम्मू संभाग में भी फैली। यहां बनिहाल क्षेत्र से विधानसभा का चुनाव लड़ चुके पूर्व आईएएस बशीर अहमद रुनयाल ने भी इस्तीफा दे दिया।
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आतंकी धमकियों, अलगाववादियों के बहिष्कार तथा तनाव को ठेंगा दिखाते हुए एक दशक बाद सफल निकाय चुनाव हुए। पंचायत चुनाव के जरिए समाज के अंतिम छोर तक लोकतंत्र पहुंचा।
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पूरे साल राज्य में राजनीतिक परिदृश्य में काफी उतार-चढ़ाव रहा। मार्च महीने में महबूबा ने सरकार में वित्त मंत्री रहे डॉ. हसीब द्राबू को पद से बर्खास्त कर दिया। उन्होंने पार्टी लाइन के विपरीत यह कह दिया था कि कश्मीर समस्या को राजनीतिक समस्या के रूप में नहीं बल्कि सामाजिक समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए।
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30 अप्रैल को तत्कालीन मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल किया। कुछ नए मंत्री शामिल किए गए। भाजपा ने अपने कोटे से उप मुख्यमंत्री डॉ. निर्मल सिंह को बदल दिया। उनके स्थान पर कवींद्र गुप्ता को लाया गया। डॉ. सिंह को विधानसभा अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी गई।
रियासत में तेजी से बदले घटनाक्रम के बाद भाजपा ने गठबंधन सरकार से 19 जून को समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद विधानसभा को निलंबित कर दिया गया। छह महीने के राज्यपाल शासन के बाद 19 दिसंबर को राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।
सरकार गिरने के बाद पीडीपी में बगावत की नौबत आ गई। नेताओं ने पार्टी नेतृत्व पर परिवारवाद तथा तानाशाही रवैया अख्तियार करने का आरोप लगाया। पार्टी से पूर्व मंत्री इमरान रजा अंसारी, डॉ. हसीब द्राबू व बशारत बुखारी, पूर्व विधायक आबिद अंसारी, मोहम्मद अब्बास वानी, पीर मोहम्मद हुसैन, यासिर रेशी, सैफुद्दीन भट समेत कुछ अन्य नेताओं ने पार्टी को अलविदा कह दिया। कश्मीर की यह लपट जम्मू संभाग में भी फैली। यहां बनिहाल क्षेत्र से विधानसभा का चुनाव लड़ चुके पूर्व आईएएस बशीर अहमद रुनयाल ने भी इस्तीफा दे दिया।
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