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19 जनवरी 1990: कश्मीरी पंडितों के पलायन के 30 साल, ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा 'हम वापस आएंगे'
Sat, 18 Jan 2020 02:21 PM IST
प्रशांत कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
Published by: प्रशांत कुमार
Updated Sat, 18 Jan 2020 02:21 PM IST
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कश्मीरी पंडितों के घर
- फोटो : अमर उजाला, फाइल फोटो
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घाटी में रहने वाले कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए 19 जनवरी प्रलय का दिन माना जाता है, क्योंकि वर्ष 1990 में हालात बिगड़ने के कारण इसी तारीख में कश्मीरी पंडित समुदाय ने कश्मीर घाटी से पलायन करना शुरू कर दिया था।
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मई 1990 तक करीब पांच लाख कश्मीरी पंडित जान बचाने के लिए अपनी मातृभूमि को छोड़ कश्मीर से पलायन कर चुके थे, जो स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा पलायन माना जाता है। इसी के चलते हर वर्ष 19 जनवरी को जहां कहीं भी कश्मीरी पंडित रहते हैं, वहां वह इस तारीख को ‘होलोकॉस्ट/एक्सोडस डे’ (प्रलय/बड़ी संख्या में पलायन की तारीख) के तौर पर मनाते हैं।
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इस तारीख को कल यानी कि रविवार को 30 साल पूरे हो जाएंगे। वहीं इस घटना को लेकर आज ट्विटर ट्रेंड चर्चा में है। ट्विटर पर हम वापस आएंगे और कश्मीर पंडित ट्रेंड कर रहा है। इस तारीख को जो भी कश्मीरी पंडित याद करता है, उसे वह यादें सिहरा कर रख देती हैं। उनके मुंह से सिर्फ यही शब्द निकलते हैं कि ऐसा दिन किसी की भी जिंदगी में कभी भी न आए।
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तब अचानक सुनाईं दीं वह आवाजें
वर्ष 1990 की उस तारीख को याद करते हुए संजय तिकू ने कहा कि सर्दियों के दिन थे। उन्हें याद है, दूरदर्शन पर फिल्म चल रही थी, जिसे वह देख रहे थे। इसी दौरान अचानक लाउड स्पीकरों पर आवाजें आने लगीं। मैने भी खिड़की से सुनने की कोशिश की, लेकिन समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है।
बाद में हर मस्जिद में ऐलान किया गया कि सब लोग आजादी के लिए बाहर निकल आओ। कश्मीरी पंडितों से भी बाहर आने को कहा गया। उन्होंने ने कहा कि उन्हें याद है कि एक-दो दिन पूर्व सीआरपीएफ ने कंट्रोल अपने हाथों में लेना शुरू किया था।
वह रात भुलाए नहीं भूलती
तिकू के अनुसार उसी रात जब ‘यहां क्या चलेगा निजाम-ए-मुस्तफा’, ‘ए जालिमों ए काफिरों कश्मीर हमारा छोड़ दो’ जैसे नारे बुलंद किए गए, तो कश्मीरी पंडितों में एक भय सा पैदा हो गया कि आखिर अब क्या होगा। वो रात कभी नहीं भूलती, क्योंकि वह रात मानो तारे गिनते हुए काटी हो। जब सुबह हुई तो माहौल खौफनाक था।
बाद में हर मस्जिद में ऐलान किया गया कि सब लोग आजादी के लिए बाहर निकल आओ। कश्मीरी पंडितों से भी बाहर आने को कहा गया। उन्होंने ने कहा कि उन्हें याद है कि एक-दो दिन पूर्व सीआरपीएफ ने कंट्रोल अपने हाथों में लेना शुरू किया था।
वह रात भुलाए नहीं भूलती
तिकू के अनुसार उसी रात जब ‘यहां क्या चलेगा निजाम-ए-मुस्तफा’, ‘ए जालिमों ए काफिरों कश्मीर हमारा छोड़ दो’ जैसे नारे बुलंद किए गए, तो कश्मीरी पंडितों में एक भय सा पैदा हो गया कि आखिर अब क्या होगा। वो रात कभी नहीं भूलती, क्योंकि वह रात मानो तारे गिनते हुए काटी हो। जब सुबह हुई तो माहौल खौफनाक था।