खतरा: ग्लोबल वार्मिग के 28 संकेतों में 19 कश्मीर में पाए गए
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कश्मीर घाटी में मौसम में बेवक्त बदलाव को विशेषज्ञ काफी गंभीरता से लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। विशेषज्ञ स्वीकार कर रहे हैं कि इस दिशा में जब तक सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठाती तब तक ऐसे बदलाव पर रोक लगाना संभव नहीं हो सकता।
घाटी में जून के महीने में बारिशों का होना और तापमान में लगातार हो रही गिरावट को असामान्य बदलाव माना जा रहा है। इससे न सिर्फ स्थानीय लोग बल्कि घाटी के विशेषज्ञ काफी परेशान दिख रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार सर्दियों जैसा मौसम घाटी में पर्यावरण में आ रहे बदलाव का परिणाम है।
कश्मीर विश्वविद्यालय केअर्थ साइंस विभाग के हेड शकील अहमद रोमशू के अनुसार विशेषज्ञ जिन 28 संकेतों को पर्यावरण में बदलाव के पीछे मुख्य कारण मानते हैं उनमें 19 संकेत कश्मीर में पाए जा रहे हैं।
ज्यादा बारिश, गर्मियों में सामान्य से कम तापमान, सर्दियों में ज्यादा तापमान, ओलावृष्टि में बढ़ोतरी आदि कई ऐसे संकेत हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कश्मीर की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि तापमान में हल्का सा उतार-चढ़ाव कोई बड़ा बदलाव का कारण बन सकता है जिससे न सिर्फ कृषि और पर्यटन पर असर पड़ेगा बल्कि पानी की किल्लत भी परेशानियों का सबब बन सकती है।
130 साल के आंकड़ों में बारिश अधिक हो रही
रोमशू के अनुसार पिछले करीब 130 वर्षों के आंकड़े के अनुसार ज्यादा बारिश हो रही है जिससे सूखे दिन कम हो रहे हैं। उनके अनुसार इस बदलाव को रोकने में अंतररार्ष्र्टीय स्तर पर शुरुआत होनी चाहिए और ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने का प्रयास किया जाए ताकि घाटी में पिछले वर्ष आई बाढ़ जैसी आपदा से बचा जाए।
कश्मीर के मौसम विभाग के निदेशक सोनम लोटस के अनुसार रिकॉर्ड पर नजर डाली जाए तो न सिर्फ जून माह में बल्कि पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष मौसम ज्यादा ठंडा है। समय-समय पर लगातार बारिशों के कारण तापमान सामान्य से काफी नीचे गिरता दिख रहा है।
इस वर्ष मार्च के महीने में रिकॉर्ड बारिश हुई है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष-2015 के बिगड़े मौसम के कारण 50 प्रतिशत सेब की फसल पर प्रभाव पड़ा है जबकि बादाम की फसल बारिश और ओलावृष्टि के कारण पूरी तरह से खराब हो चुकी है।