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कचरा निस्तारण करने में विफल हो रहा है रेलवे प्रबंधन
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जम्मू। स्वच्छता का ढिंढोरा पीटना वाला जम्मू रेलवे स्टेशन प्रशासन कचरे का निस्तारण करने में विफल साबित हो रहा है। वर्तमान में स्टेशन की सफाई से प्रतिदिन पांच से सात मीट्रिक टन कचरा निकल रहा है। इसमें से दो से तीन प्रतिशत कचरे का ही निस्तारण हो पा रहा है। जबकि अमरनाथ यात्रा के दौरान कचरे की मात्रा दस मीट्रिक टन के करीब पहुंच जाती है। हालांकि पिछले दिनों एनजीटी ने रेलवे बोर्ड को स्टेशनों पर कचरा निस्तारण करने के सख्त निर्देश दिए थे।
वर्तमान में रेलवे स्टेशन से निकाले वाले कचरे को पहले डंपिंग यार्ड में रखा जाता है। फिर उसके बाद नगर निगम द्वारा कचरे को उठाया जा रहा है। रेलवे की ईस्ट कालोनी के पास बने पुराने डंपिंग यार्ड में गंदगी का अंबार है। इसमें प्लास्टिक और पालीथिन की मात्रा अधिक है। जबकि रेलवे स्टेशन परिसर में पालीथिन बैन है। ए-1 श्रेणी का रेलवे स्टेशन होने के बाद भी कचरा के निस्तारण की कोई ठोस योजना नहीं है। रेलवे प्लेटफार्म और वाशिंग लाइन से एकत्रित होने वाला कचरा कई दिनों तक डंपिंग यार्ड में पड़ा रहता है।
बोतल क्रशर मशीन लंबे समय से खराब
स्टेशन को प्लास्टिक बोतल मुक्त रखने के लिए बोतल क्रशर मशीन लगाई थी। मशीन लगने के दो माह बाद से मशीन गायब है। रेलवे के अनुसार मशीन में खराबी आने के कारण उसे चंडीगढ़ ठीक करने भेजा था, लेकिन चार माह से मशीन ठीक होकर नहीं आ पाई है। इसके कारण स्टेशन प्लेटफार्म और पटरियों पर प्लास्टिक की बोतल फेंकी जा रही है। रेलवे से निकलने वाले कचरें में प्लास्टिक की मात्र भी अधिक हो रही है।
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वर्तमान में रेलवे स्टेशन से निकाले वाले कचरे को पहले डंपिंग यार्ड में रखा जाता है। फिर उसके बाद नगर निगम द्वारा कचरे को उठाया जा रहा है। रेलवे की ईस्ट कालोनी के पास बने पुराने डंपिंग यार्ड में गंदगी का अंबार है। इसमें प्लास्टिक और पालीथिन की मात्रा अधिक है। जबकि रेलवे स्टेशन परिसर में पालीथिन बैन है। ए-1 श्रेणी का रेलवे स्टेशन होने के बाद भी कचरा के निस्तारण की कोई ठोस योजना नहीं है। रेलवे प्लेटफार्म और वाशिंग लाइन से एकत्रित होने वाला कचरा कई दिनों तक डंपिंग यार्ड में पड़ा रहता है।
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बोतल क्रशर मशीन लंबे समय से खराब
स्टेशन को प्लास्टिक बोतल मुक्त रखने के लिए बोतल क्रशर मशीन लगाई थी। मशीन लगने के दो माह बाद से मशीन गायब है। रेलवे के अनुसार मशीन में खराबी आने के कारण उसे चंडीगढ़ ठीक करने भेजा था, लेकिन चार माह से मशीन ठीक होकर नहीं आ पाई है। इसके कारण स्टेशन प्लेटफार्म और पटरियों पर प्लास्टिक की बोतल फेंकी जा रही है। रेलवे से निकलने वाले कचरें में प्लास्टिक की मात्र भी अधिक हो रही है।
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