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जान हथेली पर रख बच्चे जाते हैं स्कूल
Updated Tue, 22 May 2018 02:20 PM IST
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कठुआ। सड़क सुरक्षा सप्ताह चल रहा है, ऐसे में यातायात नियमों का पाठ पढ़ाने का दम भरने वाले परिवहन विभाग का ध्यान शायद स्कूली वाहनों की ओर नहीं है। ऐसे में स्कूली बच्चों को घर से लाने और वापस घर ले जाने की व्यवस्था पर सवाल उठना लाजमी है।
कठुआ जिला मुख्यालय के आसपास और शहर के तमाम बड़े स्कूल बच्चों को लाने व ले जाने की व्यवस्था में लापरवाही बरत रहे हैं। बच्चों के अभिभावकों से इसके लिए हर माह रकम ली जाती है, लेकिन इस मामले में ज्यादातर स्कूल जरूरी औपचारिकताएं पूरी नहीं कर रहे हैं। स्कूलों ने निजी वाहनों को भी अनुबंध पर तैनात कर रखा है, जो बच्चों को स्कूल लाने व वापस घर ले जाने का काम करते हैं। इन वाहनों में बच्चों को ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है।
स्कूली बच्चों को लाने ले जाने में सुरक्षा का ध्यान रखना, जहां स्कूल प्रबंधन का काम है, तो यातायात नियमों का पालन करवाना यातायात विभाग का है। ऐसे में जब दोनों मिलकर काम करेंगे तभी बात बनेगी, लेकिन इसे लेकर कोई भी गंभीर नहीं दिख रहा है। जन सेवा संस्थान के शशि शर्मा ने कहा कि स्कूली बच्चों को लाने और ले जाने में लापरवाही बरती जाती है। एक स्कूली बस में भेड़-बकरियों की तरह बच्चों केे ठूंसा जाता है। सवारी आटो, जिसमें बच्चे आते-जाते हैं, उनमें तो हाल काफी खराब रहता है। बच्चों के बैग छत पर रखे जाते हैं और अंदर बच्चों को ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है। लिंक मार्गों पर ऐसे वाहन धड्डल्ले से नियमों का उल्लंघन कर चलते हैं, पर इन पर अभी तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई है। शहर और आसपास के इलाकों में आटो से ही बच्चे स्कूल आते-जाते हैं। सरकारी स्कूलों में वाहनों का प्रावधान ही नहीं है। ऐसे में परिवहन विभाग को इस मामले में कदम उठाना चाहिए।
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कठुआ जिला मुख्यालय के आसपास और शहर के तमाम बड़े स्कूल बच्चों को लाने व ले जाने की व्यवस्था में लापरवाही बरत रहे हैं। बच्चों के अभिभावकों से इसके लिए हर माह रकम ली जाती है, लेकिन इस मामले में ज्यादातर स्कूल जरूरी औपचारिकताएं पूरी नहीं कर रहे हैं। स्कूलों ने निजी वाहनों को भी अनुबंध पर तैनात कर रखा है, जो बच्चों को स्कूल लाने व वापस घर ले जाने का काम करते हैं। इन वाहनों में बच्चों को ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है।
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स्कूली बच्चों को लाने ले जाने में सुरक्षा का ध्यान रखना, जहां स्कूल प्रबंधन का काम है, तो यातायात नियमों का पालन करवाना यातायात विभाग का है। ऐसे में जब दोनों मिलकर काम करेंगे तभी बात बनेगी, लेकिन इसे लेकर कोई भी गंभीर नहीं दिख रहा है। जन सेवा संस्थान के शशि शर्मा ने कहा कि स्कूली बच्चों को लाने और ले जाने में लापरवाही बरती जाती है। एक स्कूली बस में भेड़-बकरियों की तरह बच्चों केे ठूंसा जाता है। सवारी आटो, जिसमें बच्चे आते-जाते हैं, उनमें तो हाल काफी खराब रहता है। बच्चों के बैग छत पर रखे जाते हैं और अंदर बच्चों को ठूंस-ठूंस कर भरा जाता है। लिंक मार्गों पर ऐसे वाहन धड्डल्ले से नियमों का उल्लंघन कर चलते हैं, पर इन पर अभी तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई है। शहर और आसपास के इलाकों में आटो से ही बच्चे स्कूल आते-जाते हैं। सरकारी स्कूलों में वाहनों का प्रावधान ही नहीं है। ऐसे में परिवहन विभाग को इस मामले में कदम उठाना चाहिए।
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