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अनुशासित साधक बनकर करें प्रभु की साधना
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उधमपुर में कथा सुनाते संत सुभाष शास्त्री व कथा सुनते श्रद्धालु
- फोटो : UDHAMPUR
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उधमपुर। अखंड परम धाम शिव रैहंबल चक में साप्ताहिक श्री शिव महा पुराण कथा मंगलवार को चौथे दिन भी जारी रही। इसमें स्थानीय व आसपास क्षेत्रों के लोगों ने कथावाचक सुभाष शास्त्री से प्रवचन सुने।
कथा में वाचक सुभाष शास्त्री ने बताया कि हम सनातन धर्म के उपासक हैं, जिसका केवल एक संदेश है। अपने धर्म का पालन करो और दूसरे धर्मों का सम्मान करो। आज कई तथाकथित धर्मगुरु दूसरे धर्मों के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हैं। यह ठीक नहीं है। संतों (धर्मगुरुओं) से समाज को अपेक्षा रहती है कि मानव में व्याप्त दानवता को दूर करें। इसलिए, सनातन धर्म का उपरोक्त संदेश बतलाया।
उन्होंने कहा कि हमें एक अनुशासित साधक बनकर प्रभु की साधना करनी चाहिए। यह सारा चराचर जगत भी साधना केंद्र ही है, क्योंकि यह सब ब्रह्म में है। उसी से है और वही है। उससे भिन्न नहीं। चलते-फिरते मनुष्यों में ब्रह्म दर्शन करते रहना, यह भी एक प्रकार की उपासना ही है। जब हम किसी को नमस्कार करते हैं तो उसके बाहरी शरीर को नहीं, बल्कि उसके अंदर के चेतन को ही करते हैं। असल में हर मनुष्य के अंदर प्रभु विराजता है।
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कथावाचक ने संगत को बताया कि चलते-फिरते मनुष्यों में ब्रह्म भावना करना, साकार-सगुण ब्रह्म की ही उपासना है। ऐसे भाव मन में उत्पन्न हों, इसके लिए एक मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। मार्ग कौन दिखा सकता है? जो स्वयं उस मार्ग पर चलकर स्वयं को जान पाया हो, अर्थात गुरु। केवल गुरु से दीक्षा लेकर आप असल मार्ग पर नहीं चल सकते। इसके लिए गुरु में श्रद्धा का होना अति आवश्यक है।
जहां श्रद्धा नहीं होगी, वहां गुरु के वाक्य असर नहीं करेंगे। बालक जब स्कूल में जाता है तो अध्यापक में श्रद्धा रखकर ही क, ख, ग सीखता है। क्योंकि, छोटी अवस्था में इतनी योग्यता नहीं होती कि वह अपने आप सीख सके। इसलिए, गुरु पर श्रद्धा रखकर उनके बताए मार्ग पर चलकर आप आत्म साक्षात्कार सरलता से प्राप्त कर सकते हैं।
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कथा में वाचक सुभाष शास्त्री ने बताया कि हम सनातन धर्म के उपासक हैं, जिसका केवल एक संदेश है। अपने धर्म का पालन करो और दूसरे धर्मों का सम्मान करो। आज कई तथाकथित धर्मगुरु दूसरे धर्मों के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हैं। यह ठीक नहीं है। संतों (धर्मगुरुओं) से समाज को अपेक्षा रहती है कि मानव में व्याप्त दानवता को दूर करें। इसलिए, सनातन धर्म का उपरोक्त संदेश बतलाया।
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उन्होंने कहा कि हमें एक अनुशासित साधक बनकर प्रभु की साधना करनी चाहिए। यह सारा चराचर जगत भी साधना केंद्र ही है, क्योंकि यह सब ब्रह्म में है। उसी से है और वही है। उससे भिन्न नहीं। चलते-फिरते मनुष्यों में ब्रह्म दर्शन करते रहना, यह भी एक प्रकार की उपासना ही है। जब हम किसी को नमस्कार करते हैं तो उसके बाहरी शरीर को नहीं, बल्कि उसके अंदर के चेतन को ही करते हैं। असल में हर मनुष्य के अंदर प्रभु विराजता है।
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कथावाचक ने संगत को बताया कि चलते-फिरते मनुष्यों में ब्रह्म भावना करना, साकार-सगुण ब्रह्म की ही उपासना है। ऐसे भाव मन में उत्पन्न हों, इसके लिए एक मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है। मार्ग कौन दिखा सकता है? जो स्वयं उस मार्ग पर चलकर स्वयं को जान पाया हो, अर्थात गुरु। केवल गुरु से दीक्षा लेकर आप असल मार्ग पर नहीं चल सकते। इसके लिए गुरु में श्रद्धा का होना अति आवश्यक है।
जहां श्रद्धा नहीं होगी, वहां गुरु के वाक्य असर नहीं करेंगे। बालक जब स्कूल में जाता है तो अध्यापक में श्रद्धा रखकर ही क, ख, ग सीखता है। क्योंकि, छोटी अवस्था में इतनी योग्यता नहीं होती कि वह अपने आप सीख सके। इसलिए, गुरु पर श्रद्धा रखकर उनके बताए मार्ग पर चलकर आप आत्म साक्षात्कार सरलता से प्राप्त कर सकते हैं।

उधमपुर में कथा सुनाते संत सुभाष शास्त्री व कथा सुनते श्रद्धालु- फोटो : UDHAMPUR