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किश्तवाड़ के केसर पर कुदरत का कहर
ब्यूरो/अमर उजाला, किश्तवाड़
Updated Sat, 07 Nov 2015 01:34 AM IST
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जिले केसर उत्पादकों को इस वर्ष भी भारी नुकसान उठाना पड़ा है। अभी तक मात्र पांच से 10 फीसदी केसर ही हाथ लगा है। बारिश और बढ़ी ठंड के कारण फूल निकलने बंद हो गए हैं।
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किसानों को मौसम पूरी तरह साफ होने का इंतजार है। उनका कहना है कि अभी कुछ दिनों तक केसर निकल सकता है, लेकिन उसके लिए अच्छी का खिलना जरूरी है।
तापमान बढ़ता है तो केसर के फूल खिल सकते हैं। अन्यथा किसानों की मेहनत पर पानी फिर सकता है। पिछले वर्ष इस वर्ष से अधिक केसर निकला था। इस बार और अधिक होने की किसान आस लगाए थे। लेकिन, अभी तक निराशा ही हाथ लगी है।
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किश्तवाड़ जिला कभी लोहित मंडल के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें लोहित लगभग समाप्त होने की स्थिति में है। लोहित इसलिए कि यहां केसर निकलता था। उसी को लोहित भी कहा जाता है।
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अब लोहित तो नहीं, लेकिन कुछ भाग को मंडल के नाम से अभी भी जाना जाता है। खासकर पूछाल, हटा, मता, बेड़ा भाटा, बेगाना और हिडयाल आदि का इलाका आता है, जहां सभी लोगों को सुबह केसर उठाने जाना पड़ता था।
अब यह उत्पादन सिकुड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों से लगातार केसर के उत्पादन में कमी आने से किसान परेशान हैं। किसान सुबह खेतों में जाते तो हैं, लेकिन उनके हाथ कुछ ही फूल लगते हैं।
पिछले वर्ष के मुकाबले कुछ भी नहीं
पूछाल निवासी इमरान गीरी, फारोक अहमद, मोहम्मद शफी, प्रहलाद शर्मा, बृज मोहन शर्मा, भेड़ा भाटा निवासी नितिन शर्मा, सतीश कुमार व रमेश कुमार का कहना है कि इस बार अभी तक मात्र पांच फीसदी ही केसर निकला है, जबकि लगभग 95 फीसदी केसर पर ठंड और बारिश की मार पड़ी है।
इस बार मौसम जल्दी बदल गया। इस कारण पिछले वर्ष के मुकाबले कुछ भी केसर नहीं निकला। कुछ किसानों का क हना है कि केसर का बीज भी भूमि में खराब हो गया था, वहीं कुछ का कहना है कि केसर विकास विभाग ने जो हमें खाद दी थी वह भी बीज को खराब करने का कारण बन गई।
कार्म रूट नामक बीमारी लगी
केसर निकलना इसलिए कम हो गया है, क्योंकि बारिश से ठंड बढ़ गई है। इसके अलावा बीज में ही कार्म रूट नामक बीमारी लग गई। अभी भी फूल निकल सकते हैं, लेकिन उसके लिए धूप जरूरी है।
विभाग द्वारा दिए गए खाद से बीज खराब होने के किसानों के आरोप के बाद मुख्यमंत्री ने कुछ माह पहले एक टीम भेजी थी, जिसमें विभाग के निदेशक और अन्य अधिकारी जांच करने आए थे।
पूछताछ में यह पाया गया कि जिन किसानों को एक कनाल भूमि के लिए जितनी खाद दी गई थी, उन्होंने चार या पांच मरले में डाल दी, जिससे बीज खराब हो गए, जबकि किसानों को जागरूक किया गया था।
-लक्ष्मी चंद, जिला अधिकारी, केसर विकास विभाग