{"_id":"6692f0a145f8e42e7a09ad66","slug":"katra-culture-katha-katra-news-c-309-1-sjam1002-101100-2024-07-14","type":"story","status":"publish","title_hn":"प्रभु से मांगने से नहीं, उनकी रजा से मिलेगी शांति : स्वामी राजेश्वरानंद","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
प्रभु से मांगने से नहीं, उनकी रजा से मिलेगी शांति : स्वामी राजेश्वरानंद
Sun, 14 Jul 2024 02:54 AM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, उधमपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, उधमपुर
Updated Sun, 14 Jul 2024 02:54 AM IST
विज्ञापन
श्री राजमाता आश्रम शनि मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा सातवें दिन भी रही जारी
संवाद न्यूज एजेंसी
कटड़ा। धर्मनगरी के श्री राजमाता आश्रम शनि मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा सातवें दिन भी जारी रही। इस दौरान स्वामी राजेश्वरानंद महाराज ने कहा कि भगवान से मांगने से नहीं, बल्कि उनकी रजा में राजी रहने से ही शांति मिलेगी।
शनिवार को उन्होंने गुरु पूजा के संदर्भ में बताया। स्वामी ने कहा कि कृष्ण-सुदामा को कर्मों के अनुसार एक को राजपद तो दूसरे को निर्धनता मिली। सुदामा ने मित्र कृष्ण के पास पहुंचकर भी कुछ मांगा नहीं, लेकिन श्रीकृष्ण ने उसे सब कुछ दे दिया। यह प्रसंग छोटा है, लेकिन इसका संदेश बहुत व्यापक है। इससे शिक्षा मिलती है कि हमें जो कर्मों का फल मिला है उसी में जो प्राप्त है वही प्रयाप्त है। इस सोच से परमात्मा का शुक्र मानते हुए आनंदित रहना चाहिए। क्योंकि, सुख साधनों में नहीं, बल्कि साधना में है। परमात्मा की रजा में राजी रहना ही बड़ी साधना है। सुदामा ने कुछ नहीं मांगा तो उसे सब कुछ मिल गया। दूसरी तरफ रावण हिरण्यकश्यप ने भगवान से बहुत चालाकी से वर मांगे नतीजन नाश ही तो हुआ। अत: जो प्राप्त है इसी में संतुष्ट रहना सबसे बड़ी भक्ति और संपत्ति है जो मुक्ति का मार्ग बनती है। कथा क्रम में राजा परीक्षित प्रसंग में स्वामी राजेश्वरानंद जी ने कहा कि कथा मनुष्य के जीवन में व्यथा और भय का नाश करती है।
राजा परीक्षित द्वारा शुकदेव महाराज से श्रीमद्भागवत कथा सुनने के बाद जब श्रापवश सांप डसने के लिए आया तो उसके मन से मृत्यु भय समाप्त हो चुका था। इससे शिक्षा मिलती है कि कथा श्रवण का मुख्य हेतु होना चाहिए व्यथा एवम भय से मुक्ति। कथाओं को मात्र कहानी की भांति न सुनकर ऐसे विचार रखें कि यह सब हमारे जीवन में ही घटित हो चुका है या घटने वाला है। वृंदावन से पधारे कथाव्यास आचार्य मनोज कृष्ण महाराज द्वारा भजन गाकर फूलों की होली, कृष्ण सुदामा चरित के बाद परीक्षित मोक्ष की कथा की। कथा विराम पर प्रसाद वितरित किया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
कटड़ा। धर्मनगरी के श्री राजमाता आश्रम शनि मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा सातवें दिन भी जारी रही। इस दौरान स्वामी राजेश्वरानंद महाराज ने कहा कि भगवान से मांगने से नहीं, बल्कि उनकी रजा में राजी रहने से ही शांति मिलेगी।
शनिवार को उन्होंने गुरु पूजा के संदर्भ में बताया। स्वामी ने कहा कि कृष्ण-सुदामा को कर्मों के अनुसार एक को राजपद तो दूसरे को निर्धनता मिली। सुदामा ने मित्र कृष्ण के पास पहुंचकर भी कुछ मांगा नहीं, लेकिन श्रीकृष्ण ने उसे सब कुछ दे दिया। यह प्रसंग छोटा है, लेकिन इसका संदेश बहुत व्यापक है। इससे शिक्षा मिलती है कि हमें जो कर्मों का फल मिला है उसी में जो प्राप्त है वही प्रयाप्त है। इस सोच से परमात्मा का शुक्र मानते हुए आनंदित रहना चाहिए। क्योंकि, सुख साधनों में नहीं, बल्कि साधना में है। परमात्मा की रजा में राजी रहना ही बड़ी साधना है। सुदामा ने कुछ नहीं मांगा तो उसे सब कुछ मिल गया। दूसरी तरफ रावण हिरण्यकश्यप ने भगवान से बहुत चालाकी से वर मांगे नतीजन नाश ही तो हुआ। अत: जो प्राप्त है इसी में संतुष्ट रहना सबसे बड़ी भक्ति और संपत्ति है जो मुक्ति का मार्ग बनती है। कथा क्रम में राजा परीक्षित प्रसंग में स्वामी राजेश्वरानंद जी ने कहा कि कथा मनुष्य के जीवन में व्यथा और भय का नाश करती है।
विज्ञापन
राजा परीक्षित द्वारा शुकदेव महाराज से श्रीमद्भागवत कथा सुनने के बाद जब श्रापवश सांप डसने के लिए आया तो उसके मन से मृत्यु भय समाप्त हो चुका था। इससे शिक्षा मिलती है कि कथा श्रवण का मुख्य हेतु होना चाहिए व्यथा एवम भय से मुक्ति। कथाओं को मात्र कहानी की भांति न सुनकर ऐसे विचार रखें कि यह सब हमारे जीवन में ही घटित हो चुका है या घटने वाला है। वृंदावन से पधारे कथाव्यास आचार्य मनोज कृष्ण महाराज द्वारा भजन गाकर फूलों की होली, कृष्ण सुदामा चरित के बाद परीक्षित मोक्ष की कथा की। कथा विराम पर प्रसाद वितरित किया गया।
विज्ञापन