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Udhampur News: गोबर से बन रही गैस, 15 घरों में जल रहा चूल्हा
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डोडा। जिले के भागवाह ब्लॉक की बिजरनी पंचायत के नशला गांव में स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) के तहत स्थापित गोबरधन इकाई ग्रामीण स्वच्छता, कचरा प्रबंधन और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में बदलाव की मिसाल बनकर उभर रही है। पशुओं के गोबर से तैयार हो रही बायोगैस से फिलहाल करीब 15 परिवारों के घरों में मुफ्त खाना पक रहा है। गोबरधन परियोजना का उद्देश्य गांवों में उपलब्ध पशु अपशिष्ट का उपयोग कर उसे उपयोगी संसाधन में बदलना है। नाशला में स्थापित इकाई में आसपास के क्षेत्रों से पशुओं का गोबर एकत्र कर संयंत्र में डाला जाता है, जिससे बायोगैस तैयार की जा रही है। तैयार गैस को पाइपलाइन के माध्यम से लाभार्थी परिवारों तक पहुंचाया जा रहा है।
परियोजना के लाभार्थी संजीव राणा ने बताया कि इकाई को स्थापित करने में करीब सात से आठ महीने का समय लगा और इसका लगभग 95 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। उनके अनुसार पहले गांव में पशुओं के गोबर के निस्तारण की बड़ी समस्या थी। जगह-जगह गोबर के ढेर जमा हो जाते थे, लेकिन अब इसका अधिकांश हिस्सा गोबरधन संयंत्र में उपयोग हो रहा है। उन्होंने बताया कि फिलहाल करीब 15 परिवार बायोगैस का इस्तेमाल खाना पकाने के लिए कर रहे हैं। जरूरत के अनुसार सुबह, दोपहर और शाम को गैस की आपूर्ति की जाती है।
इस इकाई का संचालन ग्रामीणों की भागीदारी से स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) के माध्यम से किया जा रहा है। ग्रामीणों को गोबर एकत्र करने और उसे संयंत्र तक पहुंचाकर प्लांट में डालने की जिम्मेदारी दी गई है। इससे परियोजना केवल स्वच्छता तक सीमित नहीं रहकर सामुदायिक भागीदारी और ग्रामीण आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा दे रही है।
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डोडा के सहायक आयुक्त विकास (एसीडी) दीन मोहम्मद अफाकी ने बताया कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत गोबरधन परियोजनाओं का उद्देश्य पशु गोबर का उत्पादक उपयोग सुनिश्चित करने के साथ ग्रामीण परिवारों को स्वच्छ खाना पकाने का ईंधन उपलब्ध कराना है।
उन्होंने बताया कि बिजरनी के नाशला गांव की गोबरधन परियोजना पर करीब 40 लाख रुपये की लागत आई है और परियोजना फिलहाल अंतिम चरण में है। परीक्षण के तौर पर यहां तैयार बायोगैस का सफलतापूर्वक करीब 15 घरों में इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रशासन की योजना इसे और अधिक परिवारों तक पहुंचाने की है ताकि स्थानीय स्तर पर तैयार स्वच्छ ईंधन का अधिकतम ग्रामीणों को लाभ मिल सके। यह पहल एक साथ स्वच्छता, कचरा प्रबंधन, वैकल्पिक ऊर्जा और ग्रामीण आत्मनिर्भरता को जोड़ रही है। पशु गोबर जैसी स्थानीय संसाधन को ईंधन में बदलकर नाशला गांव ने ग्रामीण विकास की दिशा में एक व्यावहारिक मॉडल पेश किया है।
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परियोजना के लाभार्थी संजीव राणा ने बताया कि इकाई को स्थापित करने में करीब सात से आठ महीने का समय लगा और इसका लगभग 95 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। उनके अनुसार पहले गांव में पशुओं के गोबर के निस्तारण की बड़ी समस्या थी। जगह-जगह गोबर के ढेर जमा हो जाते थे, लेकिन अब इसका अधिकांश हिस्सा गोबरधन संयंत्र में उपयोग हो रहा है। उन्होंने बताया कि फिलहाल करीब 15 परिवार बायोगैस का इस्तेमाल खाना पकाने के लिए कर रहे हैं। जरूरत के अनुसार सुबह, दोपहर और शाम को गैस की आपूर्ति की जाती है।
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इस इकाई का संचालन ग्रामीणों की भागीदारी से स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) के माध्यम से किया जा रहा है। ग्रामीणों को गोबर एकत्र करने और उसे संयंत्र तक पहुंचाकर प्लांट में डालने की जिम्मेदारी दी गई है। इससे परियोजना केवल स्वच्छता तक सीमित नहीं रहकर सामुदायिक भागीदारी और ग्रामीण आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा दे रही है।
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डोडा के सहायक आयुक्त विकास (एसीडी) दीन मोहम्मद अफाकी ने बताया कि स्वच्छ भारत मिशन के तहत गोबरधन परियोजनाओं का उद्देश्य पशु गोबर का उत्पादक उपयोग सुनिश्चित करने के साथ ग्रामीण परिवारों को स्वच्छ खाना पकाने का ईंधन उपलब्ध कराना है।
उन्होंने बताया कि बिजरनी के नाशला गांव की गोबरधन परियोजना पर करीब 40 लाख रुपये की लागत आई है और परियोजना फिलहाल अंतिम चरण में है। परीक्षण के तौर पर यहां तैयार बायोगैस का सफलतापूर्वक करीब 15 घरों में इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रशासन की योजना इसे और अधिक परिवारों तक पहुंचाने की है ताकि स्थानीय स्तर पर तैयार स्वच्छ ईंधन का अधिकतम ग्रामीणों को लाभ मिल सके। यह पहल एक साथ स्वच्छता, कचरा प्रबंधन, वैकल्पिक ऊर्जा और ग्रामीण आत्मनिर्भरता को जोड़ रही है। पशु गोबर जैसी स्थानीय संसाधन को ईंधन में बदलकर नाशला गांव ने ग्रामीण विकास की दिशा में एक व्यावहारिक मॉडल पेश किया है।