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Udhampur News: बढ़ते प्रदूषण और धूल मिट्टी से बढ़ रही सांस की बीमारियां
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उधमपुर। आज के समय में बढ़ता प्रदूषण, धूल-मिट्टी, धूम्रपान और बदलता मौसम लोगों को सांस संबंधी बीमारियों की ओर धकेल रहा है। अस्थमा और दीर्घकालिक श्वसन रोग जैसी समस्याएं अब हर उम्र के लोगों में देखने को मिल रही हैं। डॉक्टरों ने समय रहते सावधानी और सही इलाज की सलाह दी है।
दीर्घकालिक श्वसन रोग यानी लंबे समय तक रहने वाली सांस की बीमारी अब बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में आम होती जा रही है। यह बीमारी मुख्य रूप से दो तरह की होती है - एक तीव्र यानी अचानक होने वाली बीमारी और दूसरी यानी दीर्घकालिक लंबे समय तक रहने वाली बीमारी। अस्थमा ऐसी बीमारी है जो किसी भी उम्र में हो सकती है। अधिकतर मामलों में एलर्जी के कारण ऐसा होता है। जब कूड़ा, धूल, गंदगी या कोई अन्य सामान्य पदार्थ सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करता है तो शरीर उस पर प्रतिक्रिया करता है। इसके कारण सांस लेने वाली नलियां सिकुड़ जाती हैं और सांस लेने में कठिनाई होती है। कई लोगों को यह समस्या हमेशा रहती है जबकि कुछ लोगों को मौसम में बदलाव या बरसात के मौसम में यह समस्या सबसे अधिक होती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में खेती-बाड़ी और धूल वाले वातावरण में काम करने वाले लोग इस बीमारी की चपेट में ज्यादा आते हैं। कई लोग खांसी, बलगम या सांस फूलने जैसी शुरुआती समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं, जो बाद में गंभीर बीमारी का रूप ले सकती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यह बीमारी धूम्रपान और नशा करने वाले लोगों में अधिक आम है। सिगरेट और बीड़ी का धुआं फेफड़ों को कमजोर करता है और लंबे समय तक रहने पर फेफड़ों की कार्यक्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। बच्चों में भी एलर्जी और संक्रमण के कारण सांस की बीमारी बढ़ रही है। कई बार संक्रमण ठीक होने के बाद भी फेफड़ों का हिस्सा प्रभावित हो जाता है, जिससे फाइब्रोसिस जैसी बीमारी हो सकती है। इसमें फेफड़े सिकुड़ने लगते हैं और बच्चे को लगातार खांसी और सांस लेने में परेशानी बनी रहती है। घर में किसी के धूम्रपान करने का असर बच्चों पर भी पड़ता है जिसे पैसिव स्मोकिंग कहा जाता है।
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सावधानियां- लगातार खांसी, बलगम या सांस फूलने की समस्या को नजरअंदाज करना भविष्य में फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है।
कोट
धूल मिट्टी और प्रदूषण से बचें, ठंडी चीजों का सेवन कम करें और पौष्टिक भोजन लें। साथ ही किसी भी प्रकार की सांस संबंधी परेशानी होने पर खुद से दवा लेने की बजाय तुरंत डाक्टर से जांच करवानी चाहिए। इससे समय रहते नियंत्रण पाया जा सकता है।
- सुदेश रैना,चिकित्सक।
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दीर्घकालिक श्वसन रोग यानी लंबे समय तक रहने वाली सांस की बीमारी अब बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक में आम होती जा रही है। यह बीमारी मुख्य रूप से दो तरह की होती है - एक तीव्र यानी अचानक होने वाली बीमारी और दूसरी यानी दीर्घकालिक लंबे समय तक रहने वाली बीमारी। अस्थमा ऐसी बीमारी है जो किसी भी उम्र में हो सकती है। अधिकतर मामलों में एलर्जी के कारण ऐसा होता है। जब कूड़ा, धूल, गंदगी या कोई अन्य सामान्य पदार्थ सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करता है तो शरीर उस पर प्रतिक्रिया करता है। इसके कारण सांस लेने वाली नलियां सिकुड़ जाती हैं और सांस लेने में कठिनाई होती है। कई लोगों को यह समस्या हमेशा रहती है जबकि कुछ लोगों को मौसम में बदलाव या बरसात के मौसम में यह समस्या सबसे अधिक होती है।
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ग्रामीण क्षेत्रों में खेती-बाड़ी और धूल वाले वातावरण में काम करने वाले लोग इस बीमारी की चपेट में ज्यादा आते हैं। कई लोग खांसी, बलगम या सांस फूलने जैसी शुरुआती समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं, जो बाद में गंभीर बीमारी का रूप ले सकती हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यह बीमारी धूम्रपान और नशा करने वाले लोगों में अधिक आम है। सिगरेट और बीड़ी का धुआं फेफड़ों को कमजोर करता है और लंबे समय तक रहने पर फेफड़ों की कार्यक्षमता पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। बच्चों में भी एलर्जी और संक्रमण के कारण सांस की बीमारी बढ़ रही है। कई बार संक्रमण ठीक होने के बाद भी फेफड़ों का हिस्सा प्रभावित हो जाता है, जिससे फाइब्रोसिस जैसी बीमारी हो सकती है। इसमें फेफड़े सिकुड़ने लगते हैं और बच्चे को लगातार खांसी और सांस लेने में परेशानी बनी रहती है। घर में किसी के धूम्रपान करने का असर बच्चों पर भी पड़ता है जिसे पैसिव स्मोकिंग कहा जाता है।
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सावधानियां- लगातार खांसी, बलगम या सांस फूलने की समस्या को नजरअंदाज करना भविष्य में फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है।
कोट
धूल मिट्टी और प्रदूषण से बचें, ठंडी चीजों का सेवन कम करें और पौष्टिक भोजन लें। साथ ही किसी भी प्रकार की सांस संबंधी परेशानी होने पर खुद से दवा लेने की बजाय तुरंत डाक्टर से जांच करवानी चाहिए। इससे समय रहते नियंत्रण पाया जा सकता है।
- सुदेश रैना,चिकित्सक।