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Udhampur News: भद्रवाह में आधी रात से भोर तक चला ‘जागरू’ अनुष्ठान, धधकते अंगारों पर नंगे पांव चले चेले
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भद्रवाह। मंथला क्षेत्र स्थित सदियों पुराने बासुकी नाग मंदिर में प्राचीन नाग संस्कृति का रहस्यमयी एवं आस्था से जुड़ा ‘जागरू’ अनुष्ठान श्रद्धा और उत्साह के साथ आयोजित किया गया। आधी रात से सुबह तक चले इस अनुष्ठान में हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
‘जागरू’ में शामिल होने के लिए श्रद्धालु आधी रात से ही मंदिर परिसर में पहुंचने लगे। श्रद्धालु अपने साथ मशालें लेकर आए, जिन्हें एक स्थान पर एकत्र कर विशाल अलाव का रूप दिया गया। कुछ ही देर में यह अलाव धधकते अंगारों के बड़े ढेर में बदल गया।
इस दौरान मंदिर के पुजारी, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘चेला’ कहा जाता है, नाग देवता से जुड़े पारंपरिक अनुष्ठान करते रहे। सुबह होने से ठीक पहले अनुष्ठान का सबसे महत्वपूर्ण चरण आया, जब चेले नंगे पांव धधकते अंगारों के बीच से होकर गुजरे। स्थानीय भाषा में इस प्रक्रिया को ''''जागरू भन्नू'''' (अलाव को तोड़ना) कहा जाता है। इसके बाद भक्त पुजारियों से आशीर्वाद लेते हैं।
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स्थानीय मान्यता के अनुसार इस प्रक्रिया के दौरान पुजारी गहरी आस्था और जोश में आकर आने वाले वर्ष के लिए कुछ भविष्यवाणियां भी करते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इनमें से कई भविष्यवाणियां बाद में सच साबित होती हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार ‘जागरू’ नाग संस्कृति की सदियों पुरानी परंपरा है और इसका आयोजन हर वर्ष कैलाश यात्रा के समापन के दूसरे दिन किया जाता है। यह अनुष्ठान भद्रवाह की समृद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
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‘जागरू’ में शामिल होने के लिए श्रद्धालु आधी रात से ही मंदिर परिसर में पहुंचने लगे। श्रद्धालु अपने साथ मशालें लेकर आए, जिन्हें एक स्थान पर एकत्र कर विशाल अलाव का रूप दिया गया। कुछ ही देर में यह अलाव धधकते अंगारों के बड़े ढेर में बदल गया।
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इस दौरान मंदिर के पुजारी, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘चेला’ कहा जाता है, नाग देवता से जुड़े पारंपरिक अनुष्ठान करते रहे। सुबह होने से ठीक पहले अनुष्ठान का सबसे महत्वपूर्ण चरण आया, जब चेले नंगे पांव धधकते अंगारों के बीच से होकर गुजरे। स्थानीय भाषा में इस प्रक्रिया को ''''जागरू भन्नू'''' (अलाव को तोड़ना) कहा जाता है। इसके बाद भक्त पुजारियों से आशीर्वाद लेते हैं।
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स्थानीय मान्यता के अनुसार इस प्रक्रिया के दौरान पुजारी गहरी आस्था और जोश में आकर आने वाले वर्ष के लिए कुछ भविष्यवाणियां भी करते हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इनमें से कई भविष्यवाणियां बाद में सच साबित होती हैं।
स्थानीय लोगों के अनुसार ‘जागरू’ नाग संस्कृति की सदियों पुरानी परंपरा है और इसका आयोजन हर वर्ष कैलाश यात्रा के समापन के दूसरे दिन किया जाता है। यह अनुष्ठान भद्रवाह की समृद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।