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Udhampur News: 74 की उम्र में भी मिट्टी के बर्तनों को दे रहे आकार, पुश्तैनी हुनर को जिंदा रखने की जद्दोजहद
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मिट्टी के बर्तन को आकार देते तरसेम लाल जम्वाल।
- फोटो : udhampur news
उधमपुर। आधुनिकता के बढ़ते दौर में जहां बाजार में प्लास्टिक और अन्य आधुनिक वस्तुओं का चलन बढ़ता जा रहा है, वहीं पारंपरिक मिट्टी के बर्तनों की पहचान धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है। इसके बावजूद उधमपुर के सैले तालाब चौक स्थित वार्ड नंबर 15 में रहने वाले 74 वर्षीय तरसेम लाल जम्वाल आज भी अपने पुश्तैनी हुनर को संजोए हुए हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह मिट्टी को अलग-अलग आकार देकर घड़े, मटके, सुराही, गमले और दीये सहित कई तरह की वस्तुएं तैयार कर रहे हैं। उनके लिए यह केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक कला और विरासत है।
तरसेम लाल जम्वाल ने कहा, मिट्टी के बर्तन बनाने की कला उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली। उनके पिता भी शुरुआत से यही काम करते थे और उन्हें देखकर उन्होंने करीब 15 साल की उम्र में धीरे-धीरे इस हुनर में महारत हासिल कर अपना कारोबार शुरू किया। समय के साथ उनके काम का दायरा भी बढ़ा और एक समय ऐसा था जब उनके बनाए मिट्टी के बर्तन उधमपुर के अलावा रियासी, कटड़ा और बिलावर तक पहुंचते थे लेकिन अब बाजार में पहले जैसी मांग नहीं रही है। वह जरूरत और ग्राहकों के ऑर्डर के अनुसार अलग-अलग तरह के मिट्टी के बर्तन तैयार करते हैं। घड़े, मटके, सुराही और गमलों के अलावा आजकल बाजार में बिकने वाले मिट्टी के कैंपर भी बनाते हैं। मिट्टी के बर्तन तैयार करना केवल चाक पर मिट्टी को आकार देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए मिट्टी का चयन करने से लेकर उसे तैयार करने और भट्ठी में पकाने तक काफी मेहनत करनी पड़ती है।
साफ और चिकनी मिट्टी से ही तैयार होते हैं अच्छे बर्तन
मिट्टी मुख्य रूप से काली, लाल और सामान्य किस्म की होती है लेकिन घड़े और अन्य बर्तन तैयार करने के लिए चिकनी मिट्टी सबसे बेहतर रहती है। मिट्टी में जड़ें, पत्थर या अन्य कंकड़ नहीं होने चाहिए। जितनी साफ और चिकनी मिट्टी होगी, उससे तैयार होने वाले बर्तनों की बनावट और सफाई उतनी ही अच्छी आती है। उन्होंने बताया कि पहले वह सप्लाई मोड़ से मिट्टी लाते थे, लेकिन वहां अस्पताल बनने के बाद मिट्टी मिलना मुश्किल हो गया है। अब उन्हें दूसरी जगहों से मिट्टी का इंतजाम करना पड़ता है। एक गाड़ी मिट्टी खरीदने पर करीब 8 हजार रुपये खर्च होते हैं, जबकि बर्तनों को पकाने के लिए अलग से लकड़ी खरीदनी पड़ती है। लकड़ी का भाव करीब 700 रुपये प्रति क्विंटल है।
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कारीगरों को मिट्टी उपलब्ध करवाने की प्रशासन से मांग
तरसेम लाल जम्वाल ने प्रशासन से मांग की है कि पारंपरिक मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगरों को सरकारी जमीन से मिट्टी उठाने की अनुमति दी जाए। उन्होंने बताया कि कई बार सरकारी जमीन पर उपलब्ध मिट्टी उठाने की इजाजत नहीं मिलती, जिसके कारण उन्हें अपने काम के लिए कच्चा माल जुटाने में परेशानी होती है। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले पुराने कारीगरों को जरूरी सुविधाएं और मिट्टी उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि उनका कारोबार बिना किसी परेशानी के चलता रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए यह पारंपरिक कला भी सुरक्षित रह सके।
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तरसेम लाल जम्वाल ने कहा, मिट्टी के बर्तन बनाने की कला उन्हें अपने पिता से विरासत में मिली। उनके पिता भी शुरुआत से यही काम करते थे और उन्हें देखकर उन्होंने करीब 15 साल की उम्र में धीरे-धीरे इस हुनर में महारत हासिल कर अपना कारोबार शुरू किया। समय के साथ उनके काम का दायरा भी बढ़ा और एक समय ऐसा था जब उनके बनाए मिट्टी के बर्तन उधमपुर के अलावा रियासी, कटड़ा और बिलावर तक पहुंचते थे लेकिन अब बाजार में पहले जैसी मांग नहीं रही है। वह जरूरत और ग्राहकों के ऑर्डर के अनुसार अलग-अलग तरह के मिट्टी के बर्तन तैयार करते हैं। घड़े, मटके, सुराही और गमलों के अलावा आजकल बाजार में बिकने वाले मिट्टी के कैंपर भी बनाते हैं। मिट्टी के बर्तन तैयार करना केवल चाक पर मिट्टी को आकार देने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए मिट्टी का चयन करने से लेकर उसे तैयार करने और भट्ठी में पकाने तक काफी मेहनत करनी पड़ती है।
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साफ और चिकनी मिट्टी से ही तैयार होते हैं अच्छे बर्तन
मिट्टी मुख्य रूप से काली, लाल और सामान्य किस्म की होती है लेकिन घड़े और अन्य बर्तन तैयार करने के लिए चिकनी मिट्टी सबसे बेहतर रहती है। मिट्टी में जड़ें, पत्थर या अन्य कंकड़ नहीं होने चाहिए। जितनी साफ और चिकनी मिट्टी होगी, उससे तैयार होने वाले बर्तनों की बनावट और सफाई उतनी ही अच्छी आती है। उन्होंने बताया कि पहले वह सप्लाई मोड़ से मिट्टी लाते थे, लेकिन वहां अस्पताल बनने के बाद मिट्टी मिलना मुश्किल हो गया है। अब उन्हें दूसरी जगहों से मिट्टी का इंतजाम करना पड़ता है। एक गाड़ी मिट्टी खरीदने पर करीब 8 हजार रुपये खर्च होते हैं, जबकि बर्तनों को पकाने के लिए अलग से लकड़ी खरीदनी पड़ती है। लकड़ी का भाव करीब 700 रुपये प्रति क्विंटल है।
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कारीगरों को मिट्टी उपलब्ध करवाने की प्रशासन से मांग
तरसेम लाल जम्वाल ने प्रशासन से मांग की है कि पारंपरिक मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कारीगरों को सरकारी जमीन से मिट्टी उठाने की अनुमति दी जाए। उन्होंने बताया कि कई बार सरकारी जमीन पर उपलब्ध मिट्टी उठाने की इजाजत नहीं मिलती, जिसके कारण उन्हें अपने काम के लिए कच्चा माल जुटाने में परेशानी होती है। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले पुराने कारीगरों को जरूरी सुविधाएं और मिट्टी उपलब्ध करवाने की व्यवस्था की जानी चाहिए, ताकि उनका कारोबार बिना किसी परेशानी के चलता रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए यह पारंपरिक कला भी सुरक्षित रह सके।