Leh Protest: लद्दाख की आग को नजरअंदाज न करें... फिर न कहना मौका नहीं मिला, फारूक ने केंद्र पर साधा निशाना
डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने लद्दाख में बढ़ती अशांति पर केंद्र सरकार से तुरंत बातचीत शुरू करने की मांग की, कहा कि यह युवाओं की असली आवाज है, बाहरी ताकतों का हाथ नहीं। उन्होंने चेताया कि चीन पहले से घात लगाए बैठा है, और अगर सरकार ने अब भी समाधान नहीं निकाला तो हालात और बिगड़ सकते हैं।
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नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने वीरवार को कहा कि केंद्र को लद्दाख के लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उनके साथ बातचीत करनी चाहिए। उन्हें जो हालात पैदा हुए हैं उनसे सबक लेना चाहिए और दोबारा चिंगारी भड़कने का इंतजार नहीं करना चाहिए।
बता दें कि डॉ. फारूक अब्दुल्ला का यह बयान लेह में राज्य के दर्जे की मांग को लेकर हुई हिंसा के एक दिन बाद सामने आया है। पार्टी मुख्यालय नवाए में पत्रकारों से बातचीत में डॉ. अब्दुल्ला ने कहा, मैं सरकार को बताना चाहता हूं कि यह (लद्दाख) एक सीमावर्ती राज्य है।
चीन घात लगाए बैठा है, उसने जमीन पर कब्जा कर लिया है। इसे जल्द से जल्द सुलझाने का समय आ गया है। सरकार को बातचीत करके इसे सुलझाना चाहिए। इंतजार न कीजिये कि फिर से चिंगारी भड़क उठे। सरकार द्वारा हिंसा के लिए जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को जिम्मेदार ठहराए जाने के बारे में पूछे जाने पर अब्दुल्ला ने कहा कि शांति कार्यकर्ता इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं। वांगचुक ने कभी गांधीवादी रास्ता नहीं छोड़ा। आज युवाओं ने उन्हें दरकिनार कर दिया है। वह इसके लिए जिम्मेदार नहीं हैं।
जब वे भाजपा चुनाव हार गए तो उन्होंने सुरक्षा कानून लागू कर दिया और लोगों को जेलों में डाल दिया। अब वे सीबीआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे जितना ज्यादा दमन के लिए बल का इस्तेमाल करेंगे खतरा उतना ही बढ़ेगा। मैं भारत सरकार से कहना चाहता हूं कि बल का इस्तेमाल न करें और बातचीत करें।
लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर आंदोलन का समर्थन कर रही लेह अपेक्स बॉडी (एलएबी) द्वारा बुधवार को दी गई बंद की कॉल के दौरान दिन भर हुई झड़पों में चार लोगों की मौत हो गई और कम से कम 80 लोग घायल हो गए।
यह पूछे जाने पर कि क्या लद्दाख में अशांति फैलाने के लिए बाहरी ताकतें हैं, नेकां अध्यक्ष ने इस बात को खारिज कर दिया। कोई बाहरी हाथ नहीं है। यह जनता की आवाज है। उन्होंने कहा कि पिछले पांच वर्षों से लद्दाख के लोग छठी अनुसूची और राज्य के दर्जे के लिए चुपचाप विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
उनके नेता अपनी मांगों को लेकर लेह से दिल्ली तक पैदल गए। उन्होंने आंदोलन नहीं बल्कि गांधीवादी रास्ता अपनाया। लेकिन युवाओं को लगा कि वादे खोखले थे। नतीजा यह हुआ कि वे इसे और बर्दाश्त नहीं कर सके।
अब्दुल्ला ने कहा कि केंद्र को लद्दाख की स्थिति से सबक लेना चाहिए और जम्मू-कश्मीर के संबंध में अपने वादे पूरे करने चाहिए। जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने का वादा किया गया था लेकिन वह कहां है? उन्हें सबक सीखना चाहिए। आपने हमसे जो वादे किए थे, वे कहां हैं? नौकरियां कहां हैं? बाहर से लोगों को थोपा जा रहा है।
यह भी याद रखना चाहिए कि जम्मू कश्मीर के साथ भी वादा किया गया है कि पहले डिलिमिटेशन फिर इलेक्शन और फिर स्टेटहुड दिया जाएगा। आज ग्यारह महीने हो गए लेकिन स्टेटहुड का कोई निशान सामने नहीं आ रहा है। उन्हें लेह से सबक सीखना चाहिए।
यह पूछे जाने पर कि क्या उनकी पार्टी लद्दाख में हिंसक आंदोलन का समर्थन करती है, उन्होंने कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कभी गांधीवादी रास्ता नहीं छोड़ा। हमने बलिदान दिए, लेकिन कभी हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया। हालांकि युवा भविष्य में क्या करेंगे मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता। लद्दाख हिंसा के लिए भाजपा द्वारा कांग्रेस को दोषी ठहराए जाने के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए अब्दुल्ला ने कहा कि यह जिम्मेदारी से बचने की कोशिश है।
भाजपा 2019 से सत्ता में है। कांग्रेस कहां से आई? वे (भाजपा) हमेशा ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं। कांग्रेस 10 लोगों को इकट्ठा नहीं कर सकती। अब्दुल्ला ने लद्दाख की स्थिति के लिए केंद्र सरकार के नेताओं को जिम्मेदार ठहराया।
जो कुछ हो रहा है उसके लिए दिल्ली में बैठे नेता जिम्मेदार हैं। उन्होंने उन्हें बिना किसी ठोस बातचीत में उलझाए रखा। वे जेन जी निराश महसूस कर रहे हैं। अब्दुल्ला ने कहा कि जिन लोगों की इस दौरान जानें गई हैं हमारी संवेदना है उनके परिवार के साथ।