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Srinagar News: अपना दर्द छिपा पर्यटकों को मुस्कान बांट रहे स्लेज खींचने वाले
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गांदरबल के सोनमर्ग में पर्यटक। संवाद
- फोटो : samvad
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- सोनमर्ग की वादियों में हाड़ कंपा देने वाली ठंड में भी अपने काम में जुटे रहते हैं
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। सोनमर्ग की हसीन वादियों में जब ताजी बर्फ की चादर बिछती है तो दुनिया भर से लोग अपनी छुट्टियां यादगार बनाने खिंचे चले आते हैं। इसी सफेद मखमली बर्फ के नीचे दबी है उन हजारों लोगों की बेबसी, जिनके लिए यह बर्फ खूबसूरती नहीं बल्कि रोजी-रोटी है। हाड़ कंपा देने वाली ठंड में जब सैलानी महंगे थर्मल और फर वाले जैकेट पहनकर भी कांपते हैं, तब वहीं के कुछ बाशिंदे फटे हुए स्वेटर और पुरानी फेरन में मुस्कराते हुए उनका स्वागत करते हैं।
स्लेज (बर्फ की गाड़ी) खींचने वाले सोनमर्ग के सैकड़ों युवाओं में एक एजाज की कहानी भी ऐसी ही है। नंगे हाथों से स्लेज खींचते एजाज से जब पूछा गया कि क्या उन्हें ठंड नहीं लगती तो उन्होंने कहा, जनाब! कुदरत ने हमें फौलाद से गढ़ा है। जरूरतें इतनी बड़ी हैं कि ठंड का अहसास ही नहीं होने देती। यह केवल एक संवाद नहीं बल्कि उस कड़वे सच की स्वीकारोक्ति है जहां गरीबी का तापमान बर्फ की ठंडक से कहीं ज्यादा होता है।
कंगन से आए शब्बीर अहमद बताते हैं कि यहां स्लेज चलाने वालों का हुजूम है। करीब 10 हजार लोग इस आस में खड़े रहते हैं कि आज किसी सैलानी की नजर उन पर पड़ेगी। हालत यह है कि तीन-चार दिन में एक बार काम मिल पाता है। शब्बीर का कहना है कि 3-4 हजार की स्लेज ही उनकी गरीबी का एकमात्र सहारा है क्योंकि बैंक और सरकारी योजनाएं कागजों से उतरकर उन तक नहीं पहुंच पातीं।
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बीते दो दशकों में सोनमर्ग का मंजर काफी बदला है। फोटोग्राफर हिलाल याद करते हैं कि कभी यहां उंगलियों पर गिनने लायक फोटोग्राफर थे, आज उनकी तादाद 2000 पार कर चुकी है। प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है और कमाई सिमट गई है। वहीं मीर अहमद जैसे लोग जो सैलानियों को रबर के जूते किराये पर देते हैं, पर्यटकों को फरिश्ता मानते हैं। उनके लिए टूरिस्ट का आना सिर्फ बिजनेस नहीं बल्कि घर का चूल्हा जलने की गारंटी है।
पर्यटन का असली ढांचा सरकार छोटे कामगार
सैलानी अक्सर पहाड़ों की सुंदरता की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालते हैं, लेकिन उन तस्वीरों को फ्रेम करने वाले (फोटोग्राफर) या उस पॉइंट तक पहुंचाने वाले (स्लेज खींचने वाले) हमेशा बैकग्राउंड में ही रह जाते हैं। कश्मीर के पर्यटन का असली ढांचा सरकार या होटल नहीं बल्कि ये छोटे कामगार हैं जो अपनी पीठ पर पर्यटन के बोझ को ढो रहे हैं।
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अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। सोनमर्ग की हसीन वादियों में जब ताजी बर्फ की चादर बिछती है तो दुनिया भर से लोग अपनी छुट्टियां यादगार बनाने खिंचे चले आते हैं। इसी सफेद मखमली बर्फ के नीचे दबी है उन हजारों लोगों की बेबसी, जिनके लिए यह बर्फ खूबसूरती नहीं बल्कि रोजी-रोटी है। हाड़ कंपा देने वाली ठंड में जब सैलानी महंगे थर्मल और फर वाले जैकेट पहनकर भी कांपते हैं, तब वहीं के कुछ बाशिंदे फटे हुए स्वेटर और पुरानी फेरन में मुस्कराते हुए उनका स्वागत करते हैं।
स्लेज (बर्फ की गाड़ी) खींचने वाले सोनमर्ग के सैकड़ों युवाओं में एक एजाज की कहानी भी ऐसी ही है। नंगे हाथों से स्लेज खींचते एजाज से जब पूछा गया कि क्या उन्हें ठंड नहीं लगती तो उन्होंने कहा, जनाब! कुदरत ने हमें फौलाद से गढ़ा है। जरूरतें इतनी बड़ी हैं कि ठंड का अहसास ही नहीं होने देती। यह केवल एक संवाद नहीं बल्कि उस कड़वे सच की स्वीकारोक्ति है जहां गरीबी का तापमान बर्फ की ठंडक से कहीं ज्यादा होता है।
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कंगन से आए शब्बीर अहमद बताते हैं कि यहां स्लेज चलाने वालों का हुजूम है। करीब 10 हजार लोग इस आस में खड़े रहते हैं कि आज किसी सैलानी की नजर उन पर पड़ेगी। हालत यह है कि तीन-चार दिन में एक बार काम मिल पाता है। शब्बीर का कहना है कि 3-4 हजार की स्लेज ही उनकी गरीबी का एकमात्र सहारा है क्योंकि बैंक और सरकारी योजनाएं कागजों से उतरकर उन तक नहीं पहुंच पातीं।
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बीते दो दशकों में सोनमर्ग का मंजर काफी बदला है। फोटोग्राफर हिलाल याद करते हैं कि कभी यहां उंगलियों पर गिनने लायक फोटोग्राफर थे, आज उनकी तादाद 2000 पार कर चुकी है। प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है और कमाई सिमट गई है। वहीं मीर अहमद जैसे लोग जो सैलानियों को रबर के जूते किराये पर देते हैं, पर्यटकों को फरिश्ता मानते हैं। उनके लिए टूरिस्ट का आना सिर्फ बिजनेस नहीं बल्कि घर का चूल्हा जलने की गारंटी है।
पर्यटन का असली ढांचा सरकार छोटे कामगार
सैलानी अक्सर पहाड़ों की सुंदरता की तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालते हैं, लेकिन उन तस्वीरों को फ्रेम करने वाले (फोटोग्राफर) या उस पॉइंट तक पहुंचाने वाले (स्लेज खींचने वाले) हमेशा बैकग्राउंड में ही रह जाते हैं। कश्मीर के पर्यटन का असली ढांचा सरकार या होटल नहीं बल्कि ये छोटे कामगार हैं जो अपनी पीठ पर पर्यटन के बोझ को ढो रहे हैं।