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Srinagar News: हाईकोर्ट ने निजी स्कूलों की अपील की खारिज, अत्यधिक देरी का दिया हवाला
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने ऑल जम्मू एंड कश्मीर अनएडेड प्राइवेट स्कूल कोऑर्डिनेशन कमेटी की ओर से दायर एक अपील बुधवार को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने स्कूल सुरक्षा नियमों से जुड़े पिछले अदालती आदेशों को चुनौती देने में हुई अत्यधिक देरी को माफ करने से इन्कार कर दिया।
चीफ जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस रजनीश ओसवाल की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि कमेटी 2016 के एक फैसले के खिलाफ अपील दायर करने में हुई 3633 दिनों (लगभग 10 साल) की देरी के लिए कोई पर्याप्त कारण बताने में नाकाम रही। कोर्ट ने 2024 के एक आदेश के खिलाफ इंट्रा-कोर्ट अपील (अदालत के भीतर ही अपील) दायर करने में हुई अतिरिक्त 545 दिनों की देरी को भी माफ करने से इन्कार कर दिया।
यह मामला 2016 में निजी स्कूलों के संगठन की ओर से दायर एक याचिका से जुड़ा है। इस याचिका में शिक्षा अधिकारियों द्वारा स्कूलों में सुरक्षा मानकों के संबंध में जारी निर्देशों को चुनौती दी गई थी। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के अविनाश मल्होत्रा बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले को लागू करने की भी मांग की गई थी जिसमें शैक्षणिक संस्थानों के लिए सख्त सुरक्षा मानकों को अनिवार्य किया गया है।
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हाईकोर्ट ने पाया कि 2016 में मिली अनुमति के अनुसार मूल निर्देशों को चुनौती देने के बजाय याचिकाकर्ता ने बाद में उसी फैसले को लागू करने की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया। एक ऐसा कदम जिसे बेंच ने विरोधाभासी बताया। जजों ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता को मुकदमेबाजी के अलग-अलग चरणों में असंगत रुख अपनाकर एक ही समय में किसी बात को स्वीकार करने और अस्वीकार करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
आवेदन को गुण-दोष रहित (बिना किसी आधार के) पाते हुए हाईकोर्ट ने देरी को माफ करने की याचिका और उसके साथ दायर अपील दोनों को खारिज कर दिया। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध उचित कानूनी उपायों को अपनाने की स्वतंत्रता प्रदान की।
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के हाईकोर्ट ने ऑल जम्मू एंड कश्मीर अनएडेड प्राइवेट स्कूल कोऑर्डिनेशन कमेटी की ओर से दायर एक अपील बुधवार को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने स्कूल सुरक्षा नियमों से जुड़े पिछले अदालती आदेशों को चुनौती देने में हुई अत्यधिक देरी को माफ करने से इन्कार कर दिया।
चीफ जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस रजनीश ओसवाल की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि कमेटी 2016 के एक फैसले के खिलाफ अपील दायर करने में हुई 3633 दिनों (लगभग 10 साल) की देरी के लिए कोई पर्याप्त कारण बताने में नाकाम रही। कोर्ट ने 2024 के एक आदेश के खिलाफ इंट्रा-कोर्ट अपील (अदालत के भीतर ही अपील) दायर करने में हुई अतिरिक्त 545 दिनों की देरी को भी माफ करने से इन्कार कर दिया।
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यह मामला 2016 में निजी स्कूलों के संगठन की ओर से दायर एक याचिका से जुड़ा है। इस याचिका में शिक्षा अधिकारियों द्वारा स्कूलों में सुरक्षा मानकों के संबंध में जारी निर्देशों को चुनौती दी गई थी। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के अविनाश मल्होत्रा बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले को लागू करने की भी मांग की गई थी जिसमें शैक्षणिक संस्थानों के लिए सख्त सुरक्षा मानकों को अनिवार्य किया गया है।
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हाईकोर्ट ने पाया कि 2016 में मिली अनुमति के अनुसार मूल निर्देशों को चुनौती देने के बजाय याचिकाकर्ता ने बाद में उसी फैसले को लागू करने की मांग करते हुए एक आवेदन दायर किया। एक ऐसा कदम जिसे बेंच ने विरोधाभासी बताया। जजों ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता को मुकदमेबाजी के अलग-अलग चरणों में असंगत रुख अपनाकर एक ही समय में किसी बात को स्वीकार करने और अस्वीकार करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
आवेदन को गुण-दोष रहित (बिना किसी आधार के) पाते हुए हाईकोर्ट ने देरी को माफ करने की याचिका और उसके साथ दायर अपील दोनों को खारिज कर दिया। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध उचित कानूनी उपायों को अपनाने की स्वतंत्रता प्रदान की।