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Srinagar News: होकरसर रामसर साइट पर मनाया विश्व आर्द्रभूमि दिवस
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होकरसर रामसर साइट पर हुआ कार्यक्रम। स्रोत आयोजक
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श्रीनगर। विश्व प्रसिद्ध होकरसर आर्द्रभूमि में मंगलवार को विश्व आर्द्रभूमि दिवस मनाया गया। होकरसर जम्मू-कश्मीर के सबसे महत्वपूर्ण रामसर स्थलों में से एक है।
इस अवसर पर सर्दियों की हल्की धूप, फैले हुए नरकट के मैदान और हजारों प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी ने होकरसर को विज्ञान, संस्कृति, स्मृति और सामुदायिक संवाद का जीवंत मंच बना दिया। इस वर्ष का वैश्विक थीम आर्द्रभूमि और पारंपरिक ज्ञान : सांस्कृतिक विरासत का उत्सव कश्मीर की पारिस्थितिक वास्तविकताओं से गहराई से जुड़ा हुआ था। कार्यक्रम की शुरुआत वन्यजीव संरक्षण विभाग (वेटलैंड्स डिवीजन) के वन्यजीव वार्डन अल्ताफ हुसैन के स्वागत भाषण से हुई।
स्कूल फॉर रूरल डेवलपमेंट एंड एनवायरनमेंट (एसआरडीई) के सह-संस्थापक और जम्मू-कश्मीर आरटीआई मूवमेंट के अध्यक्ष डॉ. शेख गुलाम रसूल ने कहा कि आर्द्रभूमियां मात्र पारिस्थितिक इकाइयां नहीं बल्कि जीवंत सांस्कृतिक परिदृश्य हैं। इन्हें पीढ़ियों से स्वदेशी ज्ञान, रिवाजों और सामुदायिक संरक्षण से बनाए रखा गया है। उन्होंने 1972 के रामसर कन्वेंशन से लेकर अब तक के संरक्षण विकास का जिक्र करते हुए कहा कि वैश्विक नीतियां अब इस सत्य को स्वीकार कर रही हैं कि पारंपरिक ज्ञान और समुदाय की भागीदारी के बिना आर्द्रभूमियों का संरक्षण असंभव है। संवाद
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इस अवसर पर सर्दियों की हल्की धूप, फैले हुए नरकट के मैदान और हजारों प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी ने होकरसर को विज्ञान, संस्कृति, स्मृति और सामुदायिक संवाद का जीवंत मंच बना दिया। इस वर्ष का वैश्विक थीम आर्द्रभूमि और पारंपरिक ज्ञान : सांस्कृतिक विरासत का उत्सव कश्मीर की पारिस्थितिक वास्तविकताओं से गहराई से जुड़ा हुआ था। कार्यक्रम की शुरुआत वन्यजीव संरक्षण विभाग (वेटलैंड्स डिवीजन) के वन्यजीव वार्डन अल्ताफ हुसैन के स्वागत भाषण से हुई।
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स्कूल फॉर रूरल डेवलपमेंट एंड एनवायरनमेंट (एसआरडीई) के सह-संस्थापक और जम्मू-कश्मीर आरटीआई मूवमेंट के अध्यक्ष डॉ. शेख गुलाम रसूल ने कहा कि आर्द्रभूमियां मात्र पारिस्थितिक इकाइयां नहीं बल्कि जीवंत सांस्कृतिक परिदृश्य हैं। इन्हें पीढ़ियों से स्वदेशी ज्ञान, रिवाजों और सामुदायिक संरक्षण से बनाए रखा गया है। उन्होंने 1972 के रामसर कन्वेंशन से लेकर अब तक के संरक्षण विकास का जिक्र करते हुए कहा कि वैश्विक नीतियां अब इस सत्य को स्वीकार कर रही हैं कि पारंपरिक ज्ञान और समुदाय की भागीदारी के बिना आर्द्रभूमियों का संरक्षण असंभव है। संवाद
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