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Srinagar News: घाटी के भूरे भालू मार रहे कचरे में मुंह, ढूंढ ढूंढ कर खा रहे चॉकलेट और मिल्क पाउडर
Wed, 21 Dec 2022 02:17 PM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
Published by: जम्मू और कश्मीर ब्यूरो
Updated Wed, 21 Dec 2022 02:17 PM IST
सार
भूरे भालुओं पर हुए सर्वेक्षण के अध्ययन क्षेत्र में थजवास (बालटाल) वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी, सोनमर्ग, लक्षपथरी, नीलग्रथ और सरबल गांव शामिल हैं। यह क्षेत्र भालुओं का महत्वपूर्ण आवास और प्रमुख पर्यटन स्थल है।
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Srinagar
- फोटो : संवाद
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विस्तार
कश्मीर घाटी में पाए जाने वाले भूरे भालू अपने खाने का 75 फीसदी हिस्सा चॉकलेट, बिरयानी और कचरे में पड़े मिल्क पाउडर के पाउच चाट कर जुटा रहे हैं। यह खुलासा इन हिमालयी भालुओं पर वर्ष 2021 में मई से अक्तूबर तक कराए गए सर्वेक्षण में हुआ है। यह सर्वे जम्मू-कश्मीर वन्यजीव संरक्षण विभाग वाइल्ड लाइफ एसओएस के तत्वावधान में एक वन्यजीव संरक्षण चैरिटी ने किया है।
जीव विज्ञानियों के मुताबिक इसका कचरे से जुटाई गई यह खाद्य सामग्री भूरे भालू की गैस्ट्रिक आंतों की संरचना के लिए हानिकारक है और गंभीर बीमारियों का कारण बनता है। यह उनके जीवन काल को छोटा करता है। भूरे भालुओं के आवास पर अतिक्रमण के चलते इनका आबादी की ओर रुख बढ़ रहा है।
भूरे भालुओं पर हुए सर्वेक्षण के अध्ययन क्षेत्र में थजवास (बालटाल) वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी, सोनमर्ग, लक्षपथरी, नीलग्रथ और सरबल गांव शामिल हैं। यह क्षेत्र भालुओं का महत्वपूर्ण आवास और प्रमुख पर्यटन स्थल है। सोनमर्ग जोकि जोजिला तक जाता है वह भालुओं का प्रमुख आवास इलाका है। हिमालयन ब्राउन बियर इकोलॉजिकल एंड ह्यूमन-बीयर कंफ्लिक्ट इन्वेस्टिगेशन इन कश्मीर विद स्पेशल रेफरेंस टू बियर हैबिटेशन टू गारबेज डंप्स इन द सेंट्रल वाइल्डलाइफ डिवीजन शीर्षक वाली आधिकारिक रिपोर्ट हाल ही में प्रकाशित हुई थी।
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इस रिपोर्ट में यह पता चला है कि हिमालयन भूरे भालू कचरे की तरफ जा रहे हैं और तेजी से इसके आदी हो रहे हैं। भूरे भालू के मल के 408 मल नमूनों के अध्ययन से पता चला कि 86 नमूनों में प्लास्टिक कैरी बैग, मिल्क पाउडर और चॉकलेट कवर मिले हैं। कुछ सैंपल्स में कांच के अवशेष भी थे। वहीं कचरे की मात्रा जंगली पौधों, फसलों और शिकार की गई भेड़ों की तुलना में 75 प्रतिशत अधिक थी। इस दौरान शोध दल को अन्य प्रजातियों के प्रमाण भी मिले जैसे कि हिमालयन मर्मोट और मायावी एशियाई आइबेक्स भी कचरा खाते हैं।
वाइल्डलाइफ एसओएस में परियोजना प्रबंधक और शिक्षा अधिकारी आलिया मीर ने कहा, दूरस्थ इलाकों में अतिक्रमण के कारण हिमालयी भूरे भालू पिछले 2 दशकों से एक दुर्लभ दृश्य थे। हालांकि, अब भूरे भालू तेजी से मनुष्य के दायरे में आ गए हैं। वे भोजन की तलाश में कम ऊंचाई में उद्यम करते हैं। उनका अध्ययन करने के लिए हमारी टीम ने कैमरा ट्रैपिंग और प्रमुख हितधारकों - स्थानीय लोगों, खानाबदोशों और सेना के कर्मियों के साक्षात्कार जैसे तरीकों का उपयोग किया। वाइल्डलाइफ एसओएस रिसर्च टीम ने जानवरों के पैरों के निशान और स्कैटरिंग को भी ट्रैक किया। वाइल्डलाइफ एसओएस के सीईओ और सह-संस्थापक कार्तिक सत्यनारायण ने कहा, यह सर्वे वन्यजीव संरक्षण विभाग के समर्थन के बिना संभव नहीं था, जिसने हर कदम पर वाइल्डलाइफ एसओएस को सहयोग दिया।
वाइल्डलाइफ एसओएस के वरिष्ठ जीवविज्ञानी स्वामीनाथन एस ने कहा, स्कैट विश्लेषण के निष्कर्षों को कैमरा ट्रैप से एकत्र किए गए डेटा से मजबूत किया गया था, जिनमें से 62 प्रतिशत ने भूरे भालू के कचरे के ढेर पर भोजन के दृश्यों को कैद किया है। उन्होंने कहा कि यह भूरे भालू की गैस्ट्रिक आंतों की संरचना के लिए हानिकारक, गंभीर बीमारियों का कारण बनता है और उनके जीवन काल को छोटा करता है।
सर्वे से संरक्षण में मिलेगी मदद
जम्मू-कश्मीर के मुख्य वन्यजीव वार्डन सुरेश कुमार गुप्ता का कहना है कि वन्यजीव एसओएस भूरे भालू के संघर्ष और पारिस्थितिकी को समझने के लिए रेडियो कॉलर परियोजना भी शुरू करेगा। यह सर्वेक्षण इनके संरक्षण में मददगार होगा। इसके अलावा सुझाई गई सिफारिशें मदद करेंगी।
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जीव विज्ञानियों के मुताबिक इसका कचरे से जुटाई गई यह खाद्य सामग्री भूरे भालू की गैस्ट्रिक आंतों की संरचना के लिए हानिकारक है और गंभीर बीमारियों का कारण बनता है। यह उनके जीवन काल को छोटा करता है। भूरे भालुओं के आवास पर अतिक्रमण के चलते इनका आबादी की ओर रुख बढ़ रहा है।
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भूरे भालुओं पर हुए सर्वेक्षण के अध्ययन क्षेत्र में थजवास (बालटाल) वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी, सोनमर्ग, लक्षपथरी, नीलग्रथ और सरबल गांव शामिल हैं। यह क्षेत्र भालुओं का महत्वपूर्ण आवास और प्रमुख पर्यटन स्थल है। सोनमर्ग जोकि जोजिला तक जाता है वह भालुओं का प्रमुख आवास इलाका है। हिमालयन ब्राउन बियर इकोलॉजिकल एंड ह्यूमन-बीयर कंफ्लिक्ट इन्वेस्टिगेशन इन कश्मीर विद स्पेशल रेफरेंस टू बियर हैबिटेशन टू गारबेज डंप्स इन द सेंट्रल वाइल्डलाइफ डिवीजन शीर्षक वाली आधिकारिक रिपोर्ट हाल ही में प्रकाशित हुई थी।
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इस रिपोर्ट में यह पता चला है कि हिमालयन भूरे भालू कचरे की तरफ जा रहे हैं और तेजी से इसके आदी हो रहे हैं। भूरे भालू के मल के 408 मल नमूनों के अध्ययन से पता चला कि 86 नमूनों में प्लास्टिक कैरी बैग, मिल्क पाउडर और चॉकलेट कवर मिले हैं। कुछ सैंपल्स में कांच के अवशेष भी थे। वहीं कचरे की मात्रा जंगली पौधों, फसलों और शिकार की गई भेड़ों की तुलना में 75 प्रतिशत अधिक थी। इस दौरान शोध दल को अन्य प्रजातियों के प्रमाण भी मिले जैसे कि हिमालयन मर्मोट और मायावी एशियाई आइबेक्स भी कचरा खाते हैं।
वाइल्डलाइफ एसओएस में परियोजना प्रबंधक और शिक्षा अधिकारी आलिया मीर ने कहा, दूरस्थ इलाकों में अतिक्रमण के कारण हिमालयी भूरे भालू पिछले 2 दशकों से एक दुर्लभ दृश्य थे। हालांकि, अब भूरे भालू तेजी से मनुष्य के दायरे में आ गए हैं। वे भोजन की तलाश में कम ऊंचाई में उद्यम करते हैं। उनका अध्ययन करने के लिए हमारी टीम ने कैमरा ट्रैपिंग और प्रमुख हितधारकों - स्थानीय लोगों, खानाबदोशों और सेना के कर्मियों के साक्षात्कार जैसे तरीकों का उपयोग किया। वाइल्डलाइफ एसओएस रिसर्च टीम ने जानवरों के पैरों के निशान और स्कैटरिंग को भी ट्रैक किया। वाइल्डलाइफ एसओएस के सीईओ और सह-संस्थापक कार्तिक सत्यनारायण ने कहा, यह सर्वे वन्यजीव संरक्षण विभाग के समर्थन के बिना संभव नहीं था, जिसने हर कदम पर वाइल्डलाइफ एसओएस को सहयोग दिया।
वाइल्डलाइफ एसओएस के वरिष्ठ जीवविज्ञानी स्वामीनाथन एस ने कहा, स्कैट विश्लेषण के निष्कर्षों को कैमरा ट्रैप से एकत्र किए गए डेटा से मजबूत किया गया था, जिनमें से 62 प्रतिशत ने भूरे भालू के कचरे के ढेर पर भोजन के दृश्यों को कैद किया है। उन्होंने कहा कि यह भूरे भालू की गैस्ट्रिक आंतों की संरचना के लिए हानिकारक, गंभीर बीमारियों का कारण बनता है और उनके जीवन काल को छोटा करता है।
सर्वे से संरक्षण में मिलेगी मदद
जम्मू-कश्मीर के मुख्य वन्यजीव वार्डन सुरेश कुमार गुप्ता का कहना है कि वन्यजीव एसओएस भूरे भालू के संघर्ष और पारिस्थितिकी को समझने के लिए रेडियो कॉलर परियोजना भी शुरू करेगा। यह सर्वेक्षण इनके संरक्षण में मददगार होगा। इसके अलावा सुझाई गई सिफारिशें मदद करेंगी।