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Kashmir Wular Lake: कभी पीते थे झील का पानी, अब पहनने पड़ रहे मास्क और दस्ताने, प्रदूषण की मार से वुलर बेहाल

Wed, 15 Jul 2026 01:23 PM IST
Nikita Gupta भट्ट शहजाद, संवाद न्यूज एजेंसी, बांदीपोरा
भट्ट शहजाद, संवाद न्यूज एजेंसी, बांदीपोरा Published by: Nikita Gupta Updated Wed, 15 Jul 2026 01:23 PM IST
सार

वुलर झील में बढ़ते प्रदूषण, घटते जलस्तर और खराब होती पानी की गुणवत्ता के कारण सिंघाड़ा निकालने वाली हजारों महिलाओं की आजीविका और स्वास्थ्य पर संकट मंडरा रहा है।

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Health crisis looms over women of Wular Lake.
वुलर झील में महिला किसान। - फोटो : संवाद

विस्तार

हर गर्मी में बांदीपोरा की हजारों महिलाएं तड़के पांच बजे वुलर झील में उतरती हैं। पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा के तहत वे हरा सिंघाड़ा निकालती हैं, जो मछुआरा परिवारों की रोजी-रोटी का जरिया रहा है। जुलाई से सितंबर तक ये महिलाएं घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर लकड़ी की नावों में फसल भरती हैं लेकिन अब वही वुलर बदल रहा है। पानी काला पड़ गया है और बदबू फैल गई है।  जलस्तर भी घट गया है और हर संग्राहक को अब दस्ताने और मास्क पहनकर काम करना पड़ता है।

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लंकरेसिपोरा की 42 वर्षीय शबनम बेगम कहती हैं कि पीक सीजन में अब मैं सिर्फ 10 से 15 किलो ही इकट्ठा कर पाती हूं। पहले एक महिला आसानी से 30 किलो से ज्यादा ले आती थी। पानी पूरी तरह बदल गया है। दस्ताने न पहनें तो हाथों में खुजली शुरू हो जाती है। उन्होंने कहा कि बचपन में वो झील के पानी को सीधे पी लेती थीं।
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मौजूदा समय में झील में काम करने के लिए दस्ताने और मास्क पहनने पड़ते हैं, जिससे कभी पानी पीते थे। इतना ही नहीं, कुछ जगहों पर तो बदबू असहनीय है। वहीं, रूबीना बानो ने कहा कि पहले पानी साफ और ताजा था। अब हर जगह बदबू है और कई महिलाओं को काम के बाद चकत्ते हो जाते हैं।
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उन्होंने कहा कि घटते जलस्तर और घने खरपतवार के कारण फसल की गुणवत्ता भी गिर गई है। शबनम बेगम ने कहा कि हम हर साल पानी बदलते देख रहे हैं। हम रोज इसकी बदबू सूंघते हैं। इसे अपनी त्वचा पर महसूस करते हैं और अपनी मां से मिली आजीविका को धीरे-धीरे लुप्त होते देख रहे हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि सरकार ने ड्रेजिंग और संरक्षण कार्यक्रमों की घोषणा बार-बार की लेकिन जमीन पर प्रदूषण बढ़ रहा है और जलस्तर घट रहा है।

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वुलर पर 30 गांवों की आजीविका निर्भर
जुरिमांज के मछुआरे गुलाम मोहम्मद ने कहा कि लगभग 30 गांव सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से इस झील पर निर्भर हैं। जब आप गुरेज के लिए प्लास्टिक बैन कर सकते हैं तो जिले के अन्य हिस्सों में भी करें। उन्होंने कहा कि स्थानीय नालों की नियमित निगरानी करें। उन्होंने नाला मुदहमती का उदाहरण दिया, जहां लोग कचरा फेंकते हैं और वही वुलर में जाता है। लोग कहते हैं झील साफ कर रहे हैं लेकिन दो से तीन प्रतिशत हिस्से को साफ करने से क्या होगा।

मछली और सिंघाड़ा दोनों घटे
जुरिमांज के गुलाम हसन ने कहा कि वुलर कभी मीठे पानी और मछली के लिए जाना जाता था। आज बदबू से ही पता चल जाता है कि झील कितनी प्रदूषित है। उन्होंने कहा कि मछली उत्पादन गिरा, सिंघाड़ा उत्पादन भी घटा और दोनों के जाने से हमारी रोजी जा रही है। स्थानीय ठेकेदार अब्दुल रशीद ने बताया कि साल-दर-साल उत्पादन घटा है। पहले महिलाएं बहुत ज्यादा मात्रा में सिंघाड़ा सप्लाई करती थीं। अब बहुत कम हैं। उन्होंने कहा कि गुणवत्ता भी गिरी है।

सिंघाड़े में भारी धातुएं
महिलाओं के अनुभवों की पुष्टि साइंसटीफिक रिपोर्ट में प्रकाशित एक नए अध्ययन से हुई है। शोधकर्ताओं ने वुलर, डल, होकरसर और मानसबल झीलों से लिए गए पानी, तलछट और सिंघाड़े के पौधों में कैडमियम, क्रोमियम, निकल, जिंक और आयरन जैसी भारी धातुएं पाई हैं। अध्ययन में कहा गया कि सबसे ज्यादा प्रदूषण डल में है, लेकिन कश्मीर की सभी मीठे पानी की आर्द्रभूमियों में प्रदूषण खाद्य स्रोतों में पहुंच रहा है और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा बन सकता है। शोधकर्ताओं ने निरंतर निगरानी, बेहतर अपशिष्ट उपचार और सख्त प्रदूषण नियंत्रण की सिफारिश की है।

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