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दशनामी अखाड़ा के पूर्व महंत स्वामी सत्यनंद सरसवती की 27वीं पुन्य तिथी पर लोक कल्याण के लिए यज्ञ एंव भंडारा आयोजित किया गया
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पुंछ। नगर स्थित सभी समुदायों की आस्था के केंद्र राजगुरु गद्दी दशनामी अखाड़ा मंदिर के पूर्व महंत 1008 स्वामी सत्यनंद सरस्वती की बुधवार को 27 वीं पुण्यतिथि श्रद्धा एवं सम्मान के साथ मनाई गई। मंदिर समिति की तरफ से लोक कल्याण के लिए यज्ञ एवं भंडारे का आयोजन किया गया। इसमें हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
मंदिर में भजन कीर्तन एवं प्रवचनों का कार्यक्रम दिन भर जारी रहा। सुबह से ही मंदिर में श्रद्धालुओं के आनेजाने का क्रम शुरू हो गया। इस बीच सुबह 9.30 बजे मंदिर में दो दिन से चल रहे श्री रामायण के अखंड पाठ का भोग डाला गया। 9 बजे मंदिर समिति के प्रधान बसंत राम शर्मा की अगुवाई में महंत की समाधि के पास लोक कल्याण की कामना को लेकर यज्ञ शुरू किया गया। इसमें मंदिर समिति के सदस्यों के अलावा बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।। दोपहर 1बजे यज्ञ की पूर्णाहुति डाली गई।
मंदिर के प्रधान बसंत राम शर्मा ने बताया कि सदियों पुराने इस मंदिर की गद्दी पर विराजमान होने वाले महंतों को राजगुुरु का पद प्राप्त होता था। मंदिर की स्थापना के बाद से इसे राजगुरु गद्दी दशनामी अखाड़ा कहा जाता है। यहां बडे-बड़े संत महात्माओं ने गद्दी पर बैठ कर सभी लोगों की सेवा करते हुए उन्हें धर्ममार्ग पर चलाया है, जिससे क्षेत्र में भाईचारा बना है। वर्तमान महंत 1008 स्वामी विश्वात्मां नंद सरस्वती जी से पहले इस गद्दी पर विराजमान महंत 1008 स्वामी सत्यनंद सरस्वती ने करीब 27 वर्ष पूर्व इस संसार को छोड़ दिया।
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मंदिर में भजन कीर्तन एवं प्रवचनों का कार्यक्रम दिन भर जारी रहा। सुबह से ही मंदिर में श्रद्धालुओं के आनेजाने का क्रम शुरू हो गया। इस बीच सुबह 9.30 बजे मंदिर में दो दिन से चल रहे श्री रामायण के अखंड पाठ का भोग डाला गया। 9 बजे मंदिर समिति के प्रधान बसंत राम शर्मा की अगुवाई में महंत की समाधि के पास लोक कल्याण की कामना को लेकर यज्ञ शुरू किया गया। इसमें मंदिर समिति के सदस्यों के अलावा बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।। दोपहर 1बजे यज्ञ की पूर्णाहुति डाली गई।
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मंदिर के प्रधान बसंत राम शर्मा ने बताया कि सदियों पुराने इस मंदिर की गद्दी पर विराजमान होने वाले महंतों को राजगुुरु का पद प्राप्त होता था। मंदिर की स्थापना के बाद से इसे राजगुरु गद्दी दशनामी अखाड़ा कहा जाता है। यहां बडे-बड़े संत महात्माओं ने गद्दी पर बैठ कर सभी लोगों की सेवा करते हुए उन्हें धर्ममार्ग पर चलाया है, जिससे क्षेत्र में भाईचारा बना है। वर्तमान महंत 1008 स्वामी विश्वात्मां नंद सरस्वती जी से पहले इस गद्दी पर विराजमान महंत 1008 स्वामी सत्यनंद सरस्वती ने करीब 27 वर्ष पूर्व इस संसार को छोड़ दिया।
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