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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Parveen Akhtar sister of Mohammad Aslam who lost four nephews and nieces in Jammu

'सदा के लिए शांत हो गए इन कब्रों में..': तीन घरों के बुझ गए चिराग, व्यथा सुनाते ही फूट पड़ते हैं परवीन के आंसू

Thu, 16 Jan 2025 03:32 PM IST
श्याम जी. अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू
अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: श्याम जी. Updated Thu, 16 Jan 2025 03:32 PM IST
सार

परवीन आंखे पोंछने के बाद कहती हैं, 'असलम मेरा भाई है। ये भी छोटा सा था तो मामा ने इसे पाला। मामा की कोई संतान नहीं होने पर उन्होंने इसे गोद लिया था। बच्चों की मौत के सदमे में अब मामा भी गुजर गए। हमारे पास अब कुछ नहीं बचा है।'

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Parveen Akhtar sister of Mohammad Aslam who lost four nephews and nieces in Jammu
परवीन अख्तर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

चार भतीजे-भतीजियों को खोने वाले मोहम्मद असलम की बहन परवीन अख्तर की आंखों से से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। घर पर कोई भी आता है तो भीतर से दहलीज पर आते ही परवीन बिलख पड़ती हैं। भारी गले से कहती हैं, 'मेरे बच्चों को कौन खा गया... कोई मुझे इतना बता दे। मुझे और कुछ नहीं चाहिए। मेरे तीनों घर सूने हो गए। सब बूढ़े बचे हैं। मेरे पास रोज बच्चे खेलने के लिए आते थे। रोज मुझे हंसाते थे और आज रुला कर चले गए। कोई इसका जवाब नहीं दे रहा है कि मेरे बच्चों को किसने मार डाला।'

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परवीन आंखे पोंछने के बाद कहती हैं, 'असलम मेरा भाई है। ये भी छोटा सा था तो मामा ने इसे पाला। मामा की कोई संतान नहीं होने पर उन्होंने इसे गोद लिया था। बच्चों को मौत के सदमे में अब मामा भी गुजर गए। हमारे पास अब कुछ नहीं बचा है। इस जमीन और घर को क्या करना है अब। इतना कहकर सिसकियां लेने लगती हैं और जोर-जोर से रोने लगती हैं। गांव की औरतें उसे संभालती है और किसी तरह से अंदर ले जाती हैं। 
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पढ़ने में होशियार था 14 वर्षीय हजूर
मोहम्मद असमल का 14 वर्षीय बेटा हजूर बड्डाल गली में एक एकेडमी में आठवीं कक्षा में पढ़ता था। गांव वालों ने बताया कि हजूर गांव के सभी बच्चों में पढ़ने 50 बच्चों में होशियार था। वह कबड्डी खिलाड़ी बनना चाहता था। हर रोज वह यहीं पर कबड्डी खेलने के लिए आता था। स्वभाव से भी वह मिलनसार था। गांव वाले उसे कभी नहीं भुला पाएंगे। 
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रोज यहां खेलने वाले बच्चे यहीं सदा के लिए सो गए
खाना खाने के बाद बीमार पड़ने से मरे नवोना कौसर, जहूर अहमद और मोहम्मद मारुफ को घर के पोछे दफनाया गया है। यहां पर हर कोई उनको देखने के पहुंचता है और कब्रों को देखते आंसू बहने लगता है। बच्चों की कब्रों के पास खड़े दादा मो. शरीफ और पिता असलम ने बताया कि रोज ये बच्चे यहीं पर खेलने के लिए आते थे। कल तक यहां इनका शोर था, अब ये सदा के लिए शांत हो गए हैं इन कब्रों में...।

सफीना का नहीं पहुंचा शव, लोगों में नाराजगी
सफीना कौसर (12) का सब बुधवार को बड्डाल नहीं पहुंच पाया। सफीना की मौत मंगलवार दोपहर 3.30 बजे जम्मू के एसएमएस अस्पताल में हुई। बुधवार को पूरा दिन परिवार बच्ची के शव का इंतजार करता रहा। शाम तक शव नहीं आने पर लोगों का गुस्सा फूट गया। बच्ची के दादा मोहम्मद शरीफ और पिता असलम ने कहा कि ऐसा कौन सा पोस्टमार्टम है जो स्वास्थ्य विभाग की टीम से नहीं हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग 38 दिन से न तो कोई रिपोर्ट सार्वजनिक कर पाया है और न ही मौतों का सही कारण बता पाया है।

दो और महिलाओं की तबीयत हुई खराब
बड्डाल में बुधवार शाम करीब चार बजे दो और महिलाओं की तबीयत बिगड़ गई। जट्टी बेगम (60) और शकिया बेगम को भी मृत बच्चों की तरह पसीना आने लगा, तो लोगों ने तुरंत राजोरी जीएमसी के डॉक्टरों को सूचित किया। इस पर गांव में ही मौजूद डॉक्टरों की टीम को सूचित किया गया। डॉक्टरों ने महिलाओं का चेकअप किया और सेहत को दुरुस्त बताया। डॉक्टर फारूक ने कहा कि मानसिक तनाव के कारण महिलाओं को ऐसा हुआ है। इनमें किसी बीमारी के लक्षण नहीं हैं। दवाएं दे दी गई हैं। फिलहाल परिजनों ने उन्हें अस्पताल से जाने से मना कर दिया है।


पांच विशेषज्ञों का पैनल राजोरी पहुंचा
बड्डाल में जांच के लिए देशभर के प्रतिष्ठित संस्थानों से पांच विशेषज्ञों का पैनल बुधवार को राजोरी पहुंच गया। ये विशेषज्ञ अगले कुछ दिन तक प्रभावित क्षेत्र में रहकर जांच करेंगे। बताया गया कि बड्डाल मामले में देशभर के के कई विशेषज्ञों से पहले ही राय ली जा चुकी है, जिसमें 99 प्रतिशत तक किसी संक्रामक बीमारी की पुष्टि नहीं हुई है। स्थानीय चिकित्सा टीमों ने क्षेत्रीय दुकानदारों, दवा की दुकानों, आम लोगों से बातचीत की। कहीं भी किसी में लक्षण नहीं मिले हैं।

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