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आस्था के साथ महिलाओं ने रखा संकट चतुर्थी का व्रत
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कठुआ। परिवार की सुख समृद्धि और पुत्रों की दीर्घायु की कामना के साथ जिले में महिलाओं ने संकट चतुर्थी का व्रत रखा। शुक्रवार को पर्व के चलते शहर के बाजार में काफी संख्या में महिलाओं ने पूजन में इस्तेमाल होने वाले गुड़, तिल, गन्ना और मूली जैसे सामान की खरीददारी की।
पर्व के चलते महिलाओं में विशेष उत्साह देखा गया। जिन्होंने सुबह सरगी खाकर व्रत शुरू किया। इस दौरान काफी संख्या में महिलाओं ने भगवान गणेश के मंदिरों में पूजा-अर्चना की। वहीं, दिन के समय अर्घ्य देने के लिए महिलाओं ने तिल, गुड़, गन्ना, मूली आदि की खरीददारी की। दिनभर निराहार व्रत के उपरांत रात चन्द्रोदय होने पर महिलाओं ने चंद्र देव को अर्घ्य देकर अपने पुत्रों के दीर्घायु होने के साथ परिवार की सुखसमृद्धि की कामना की। कई महिलाओं ने पूजन के उपरांत अपने पुत्रों की ढाई मुट्ठी पुगे सहित तिल, गुड़, गन्ना, मूली का दान करवाया।
व्रती महिला अंजू शर्मा ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार एक विधवा ब्राह्मणी जो कि भगवान श्री गणेश की अनन्य भक्त थी। उसके बेटे की बलि देने के लिए नगर के एक कुम्हार ने अपने मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए जलाई जाने वाली आग में डाल दिया। लेकिन भगवान श्री गणेश की कृपा से ब्राम्हणी का पुत्र उस आग से भी सुरक्षित रहा। जिसके ग्लानि से भरे कुम्हार ने नगर के राजा को सारी कथा सुनाई और ब्राह्मणी को उसका बेटा सौंप दिया। जिसके बाद राजा के आदेश से वहां हर साल माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकट चतुर्थी के रूप से परंपरा शुरू हो गई जो आज भी जारी है। उन्होंने कहा कि वैसे भी भगवान श्री गणेश सुख और समृद्धि के दाता हैं। उनके पूजन से पूरे परिवार से संकट दूर होते हैं।
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पर्व के चलते महिलाओं में विशेष उत्साह देखा गया। जिन्होंने सुबह सरगी खाकर व्रत शुरू किया। इस दौरान काफी संख्या में महिलाओं ने भगवान गणेश के मंदिरों में पूजा-अर्चना की। वहीं, दिन के समय अर्घ्य देने के लिए महिलाओं ने तिल, गुड़, गन्ना, मूली आदि की खरीददारी की। दिनभर निराहार व्रत के उपरांत रात चन्द्रोदय होने पर महिलाओं ने चंद्र देव को अर्घ्य देकर अपने पुत्रों के दीर्घायु होने के साथ परिवार की सुखसमृद्धि की कामना की। कई महिलाओं ने पूजन के उपरांत अपने पुत्रों की ढाई मुट्ठी पुगे सहित तिल, गुड़, गन्ना, मूली का दान करवाया।
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व्रती महिला अंजू शर्मा ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार एक विधवा ब्राह्मणी जो कि भगवान श्री गणेश की अनन्य भक्त थी। उसके बेटे की बलि देने के लिए नगर के एक कुम्हार ने अपने मिट्टी के बर्तन पकाने के लिए जलाई जाने वाली आग में डाल दिया। लेकिन भगवान श्री गणेश की कृपा से ब्राम्हणी का पुत्र उस आग से भी सुरक्षित रहा। जिसके ग्लानि से भरे कुम्हार ने नगर के राजा को सारी कथा सुनाई और ब्राह्मणी को उसका बेटा सौंप दिया। जिसके बाद राजा के आदेश से वहां हर साल माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकट चतुर्थी के रूप से परंपरा शुरू हो गई जो आज भी जारी है। उन्होंने कहा कि वैसे भी भगवान श्री गणेश सुख और समृद्धि के दाता हैं। उनके पूजन से पूरे परिवार से संकट दूर होते हैं।
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