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सुख की प्राप्ति के लिए संतोष जरूरी
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कथा का श्रवण करते श्रद्धालु। संवाद
- फोटो : KATHUA
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कठुआ। गांव के देवो चक में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन जारी है। सोमवार को कथा के पांचवे दिन कथावाचक सुभाष शास्त्री उपस्थित श्रद्धालुओं को सुखी रहने का मूल मंत्र देते हुए कहा कि अगर आप कर्म बंधन से मुक्त होंगे, तभी आपको सच्चा आनंद प्राप्त हो सकता है।
शास्त्री जी ने कहा कि संसार का हर प्राणी सुखी और आनंदित रहना चाहता है। इसके लिए उसे अपने अंदर यह भाव उत्पन्न करना होगा कि जो कुछ भी उसके पास है, वह प्रभु का दिया हुआ है और उसी का है। हम जो कर्म करते हैं उसे श्रीमद्भागवत गीता के उपदेश अनुसार निष्काम भाव से करना होगा। इसी से हमें सच्चा आनंद प्राप्त होगा।
शास्त्री जी ने बताया कि संतोष रूपी अमृत से तृप्त और शांत चित्त वाले मनुष्य को जो सुख और शांति व आनंद की प्राप्ति होती है, वह धन रूपी सुख को पाने की चाह में इधर-उधर भागने वाले व्यक्ति को नहीं मिल सकती है। इस बात को हमें भली-भांति समझना होगा कि मनुष्य के मन में संतोष का होना स्वर्ग की प्राप्ति से बढ़कर है। इसलिए मनुष्य को सदा ही ऐसे शुभ कर्म करने चाहिए। जिससे संसार के सभी पदार्थ उसके लिए हितकारी सिद्धू हो और सभी लोग उसके प्रति कृतज्ञता का अनुभव करें। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य इंद्रियों को वश में नहीं रख सकता तो उसकी सारी विद्या अनुभव व्यर्थ है। इंद्रियों का दास होना आपकी विशिष्टता नहीं है। यदि ऐसा होता है तो सतगुरु को यह बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि यह करो और यह न करो। हमें इंद्रियों को दमित नहीं करना है अपितु उन पर देश काल और परिस्थिति के अनुसार मर्यादा का पालन करते हुए विजय प्राप्त करनी है। इस तरह न तो हमारे कारण किसी को कष्ट होगा और न हम खुद कष्टों को प्राप्त होंगे।
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शास्त्री जी ने कहा कि संसार का हर प्राणी सुखी और आनंदित रहना चाहता है। इसके लिए उसे अपने अंदर यह भाव उत्पन्न करना होगा कि जो कुछ भी उसके पास है, वह प्रभु का दिया हुआ है और उसी का है। हम जो कर्म करते हैं उसे श्रीमद्भागवत गीता के उपदेश अनुसार निष्काम भाव से करना होगा। इसी से हमें सच्चा आनंद प्राप्त होगा।
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शास्त्री जी ने बताया कि संतोष रूपी अमृत से तृप्त और शांत चित्त वाले मनुष्य को जो सुख और शांति व आनंद की प्राप्ति होती है, वह धन रूपी सुख को पाने की चाह में इधर-उधर भागने वाले व्यक्ति को नहीं मिल सकती है। इस बात को हमें भली-भांति समझना होगा कि मनुष्य के मन में संतोष का होना स्वर्ग की प्राप्ति से बढ़कर है। इसलिए मनुष्य को सदा ही ऐसे शुभ कर्म करने चाहिए। जिससे संसार के सभी पदार्थ उसके लिए हितकारी सिद्धू हो और सभी लोग उसके प्रति कृतज्ञता का अनुभव करें। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य इंद्रियों को वश में नहीं रख सकता तो उसकी सारी विद्या अनुभव व्यर्थ है। इंद्रियों का दास होना आपकी विशिष्टता नहीं है। यदि ऐसा होता है तो सतगुरु को यह बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि यह करो और यह न करो। हमें इंद्रियों को दमित नहीं करना है अपितु उन पर देश काल और परिस्थिति के अनुसार मर्यादा का पालन करते हुए विजय प्राप्त करनी है। इस तरह न तो हमारे कारण किसी को कष्ट होगा और न हम खुद कष्टों को प्राप्त होंगे।
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