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Kathua News: बालकनी से तारे न दिखने पर छात्रा ने बनाया ‘स्काईक्यूआई’ एप, प्रकाश प्रदूषण मापना हुआ आसान
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संवाद न्यूज एजेंसी
उधमपुर/ गुरुग्राम। अपनी बालकनी से रात के आसमान में मुश्किल से दस-बारह तारे देख पाने की निराशा को गुरुग्राम की एक स्कूली छात्रा ने एक क्रांतिकारी वैज्ञानिक खोज में बदल दिया है। मूल रूप से उधमपुर निवासी और वर्तमान में गुरुग्राम में रह रही 12वीं कक्षा की छात्रा सुहानी गुप्ता पुत्री भुवन गुप्ता ने एक ऐसी नवीन तकनीक विकसित की है, जो किसी भी साधारण स्मार्टफोन को लाइट पॉल्यूशन मापने वाले वैज्ञानिक उपकरण में बदल देती है।
एमिटी इंटरनेशनल स्कूल गुरुग्राम में पढ़ने वाली सुहानी ने इस तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट कार्यालय में पेटेंट आवेदन भी दाखिल किया है।
सुहानी की तरफ से विकसित प्लेटफॉर्म www.skyqi.in रात के आसमान की सामान्य तस्वीरों का कंप्यूटर विजन से विश्लेषण करता है। यह आकाश की चमक को मापकर खगोलविदों द्वारा उपयोग किए जाने वाले बोर्टल पैमाने पर वर्गीकृत करता है। आकाश की गुणवत्ता मापने वाले पेशेवर वैज्ञानिक उपकरणों की कीमत 12,000 से 35,000 रुपये तक होती है, जबकि स्काईक्यूआई के माध्यम से लोग अपनी जेब में रखे साधारण स्मार्टफोन से यह काम मुफ्त में कर सकते हैं।
यह तकनीक फोटो में तीन प्रमुख पहलुओं का विश्लेषण करती है:
- दृश्यमान तारों की संख्या।
- क्षितिज और सिर के ऊपर के आसमान की चमक का अंतर।
- आकाश की गणना की गई कुल चमक।
इन तीनों का मिलान कर जहां रीडिंग मेल नहीं खातीं, उन्हें सिस्टम अपने आप खारिज कर देता है। इस नवोन्मेषी तरीके के लिए फरवरी 2026 में भारतीय पेटेंट आवेदन दाखिल किया गया है। वर्तमान में 66 से अधिक देशों के लोग इस प्लेटफॉर्म पर अपने क्षेत्र के आसमान की रीडिंग अपलोड कर चुके हैं।
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नासा डेटा से अध्ययन: भारत के शहरों का आसमान 70 प्रतिशत अधिक चमकीला
स्काईक्यूआई विकसित करने के बाद सुहानी ने नासा के 10 वर्षों के उपग्रह डेटा का उपयोग करके भारत के 50 प्रमुख शहरों का गहन अध्ययन किया। विश्लेषण के अनुसार 2015 की तुलना में भारतीय शहरों का रात का आसमान औसतन 70 प्रतिशत अधिक चमकीला (प्रकाश प्रदूषित) हो गया है। अध्ययन के मुताबिक देश में केवल छह शहर मनाली, लेह, शिमला, जैसलमेर, दार्जिलिंग और ऊटी ही ऐसे बचे हैं जहां का आसमान इतना अंधेरा है कि वहां से मिल्की वे यानि आकाशगंगा साफ देखी जा सकती है। देश की राजधानी दिल्ली बोर्टल पैमाने की सबसे अधिक चमकीली (प्रदूषित) श्रेणी में पाई गई।
सुहानी का मानना है कि लाइट प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जिसे सही रणनीतियों से जल्द सुधारा जा सकता है। सुहानी का कहना है, प्रकाश प्रदूषण उन गिने-चुने प्रदूषणों में से है जिन्हें हम शहरों की रोशनी व्यवस्था में सुधार करके बहुत जल्द कम कर सकते हैं लेकिन जिसे मापा न जा सके, उसे सुधारा नहीं जा सकता। स्काईक्यूआई हर आम नागरिक को इस मापन प्रक्रिया से जोड़ता है।
आम नागरिक, विद्यार्थी और खगोल-प्रेमी www.skyqi.in या मोबाइल एप के जरिए रात के आसमान की तस्वीरें अपलोड करके इस नागरिक विज्ञान पहल का हिस्सा बन सकते हैं। 50 शहरों की विस्तृत रिपोर्ट और डेटा वेबसाइट पर मुफ्त उपलब्ध है। सुहानी की इस वैश्विक उपलब्धि पर उधमपुर निवासी उनके दादा रमेश गुप्ता एवं दादी प्रेमलता गुप्ता ने अपनी पोती को बधाई दी है और भविष्य में भी इसी तरह विज्ञान व समाज के हित में नए अनुसंधान करने का आशीर्वाद दिया है।
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उधमपुर/ गुरुग्राम। अपनी बालकनी से रात के आसमान में मुश्किल से दस-बारह तारे देख पाने की निराशा को गुरुग्राम की एक स्कूली छात्रा ने एक क्रांतिकारी वैज्ञानिक खोज में बदल दिया है। मूल रूप से उधमपुर निवासी और वर्तमान में गुरुग्राम में रह रही 12वीं कक्षा की छात्रा सुहानी गुप्ता पुत्री भुवन गुप्ता ने एक ऐसी नवीन तकनीक विकसित की है, जो किसी भी साधारण स्मार्टफोन को लाइट पॉल्यूशन मापने वाले वैज्ञानिक उपकरण में बदल देती है।
एमिटी इंटरनेशनल स्कूल गुरुग्राम में पढ़ने वाली सुहानी ने इस तकनीक के लिए भारतीय पेटेंट कार्यालय में पेटेंट आवेदन भी दाखिल किया है।
सुहानी की तरफ से विकसित प्लेटफॉर्म www.skyqi.in रात के आसमान की सामान्य तस्वीरों का कंप्यूटर विजन से विश्लेषण करता है। यह आकाश की चमक को मापकर खगोलविदों द्वारा उपयोग किए जाने वाले बोर्टल पैमाने पर वर्गीकृत करता है। आकाश की गुणवत्ता मापने वाले पेशेवर वैज्ञानिक उपकरणों की कीमत 12,000 से 35,000 रुपये तक होती है, जबकि स्काईक्यूआई के माध्यम से लोग अपनी जेब में रखे साधारण स्मार्टफोन से यह काम मुफ्त में कर सकते हैं।
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यह तकनीक फोटो में तीन प्रमुख पहलुओं का विश्लेषण करती है:
- दृश्यमान तारों की संख्या।
- क्षितिज और सिर के ऊपर के आसमान की चमक का अंतर।
- आकाश की गणना की गई कुल चमक।
इन तीनों का मिलान कर जहां रीडिंग मेल नहीं खातीं, उन्हें सिस्टम अपने आप खारिज कर देता है। इस नवोन्मेषी तरीके के लिए फरवरी 2026 में भारतीय पेटेंट आवेदन दाखिल किया गया है। वर्तमान में 66 से अधिक देशों के लोग इस प्लेटफॉर्म पर अपने क्षेत्र के आसमान की रीडिंग अपलोड कर चुके हैं।
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नासा डेटा से अध्ययन: भारत के शहरों का आसमान 70 प्रतिशत अधिक चमकीला
स्काईक्यूआई विकसित करने के बाद सुहानी ने नासा के 10 वर्षों के उपग्रह डेटा का उपयोग करके भारत के 50 प्रमुख शहरों का गहन अध्ययन किया। विश्लेषण के अनुसार 2015 की तुलना में भारतीय शहरों का रात का आसमान औसतन 70 प्रतिशत अधिक चमकीला (प्रकाश प्रदूषित) हो गया है। अध्ययन के मुताबिक देश में केवल छह शहर मनाली, लेह, शिमला, जैसलमेर, दार्जिलिंग और ऊटी ही ऐसे बचे हैं जहां का आसमान इतना अंधेरा है कि वहां से मिल्की वे यानि आकाशगंगा साफ देखी जा सकती है। देश की राजधानी दिल्ली बोर्टल पैमाने की सबसे अधिक चमकीली (प्रदूषित) श्रेणी में पाई गई।
सुहानी का मानना है कि लाइट प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जिसे सही रणनीतियों से जल्द सुधारा जा सकता है। सुहानी का कहना है, प्रकाश प्रदूषण उन गिने-चुने प्रदूषणों में से है जिन्हें हम शहरों की रोशनी व्यवस्था में सुधार करके बहुत जल्द कम कर सकते हैं लेकिन जिसे मापा न जा सके, उसे सुधारा नहीं जा सकता। स्काईक्यूआई हर आम नागरिक को इस मापन प्रक्रिया से जोड़ता है।
आम नागरिक, विद्यार्थी और खगोल-प्रेमी www.skyqi.in या मोबाइल एप के जरिए रात के आसमान की तस्वीरें अपलोड करके इस नागरिक विज्ञान पहल का हिस्सा बन सकते हैं। 50 शहरों की विस्तृत रिपोर्ट और डेटा वेबसाइट पर मुफ्त उपलब्ध है। सुहानी की इस वैश्विक उपलब्धि पर उधमपुर निवासी उनके दादा रमेश गुप्ता एवं दादी प्रेमलता गुप्ता ने अपनी पोती को बधाई दी है और भविष्य में भी इसी तरह विज्ञान व समाज के हित में नए अनुसंधान करने का आशीर्वाद दिया है।