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विश्व मानचित्र पर चमकेगी बसोहली चित्रकला
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बसोहली। विश्वस्थली संस्था की ओर से रामलीला मैदान के नजदीक पेंटिंग कार्यशाला में पदमश्री विजय शर्मा व भुवनेश्वर शर्मा ने प्रतिभागी विद्यार्थियों को पेंटिंग की बारीकियां बताई। इस दौरान उन्होंने कहा कि बसोहली चित्रकला विश्व की एक अहम धरोहरों में से एक है। वहीं, विश्वस्थली संस्था के प्रधान जगदीश ब्रह्मी ने बताया कि बसोहली की पहचान चित्रकला से हैं और विश्व स्थली संस्था इसे विश्व के मानचित्र पर लाने के लिए प्रयास कर रही है। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य बसोहली पेंटिंग के प्रति लोगों के रुझान को बढ़ाना है।
कार्यशाला में भाग लेने वाले बसोहली निवासी धीरज कपूर ने बताया कि स्कूल की किताबों से चित्र देखकर कागजों पर उकेरना शुरू किया था। 12 वर्ष की आयु में पेंटिंग सीखने की शुरुआत की थी, जिसके बाद बसोहली चित्रकला को देखकर घर आकर उसकी प्रैक्टिस करने लगे और चित्रों को कागजों पर उकेरने लगे। धीरे-धीरे पेंटिंग की सभी कलाओं के बारे में जाना। 1995 में इस कला की बारीकियां सीखने के लिए अपने गुरु पदमश्री विजय शर्मा के साथ चले गए और उनसे बारीकियां सीखी। चित्रकला अब रोजगार का साधन भी बन गया है। एक माह में करीब 60 पेंटिंग बना देते हैं, जिससे करीब 50,000 की आमदनी हो जाती है। आगे उन्होंने बताया कि होटलों में पेंटिंग की ज्यादा मांग है। मुंबई, पुणे, लखनऊ और विदेशों में बसोहली चित्रकला के नायाब चित्रों की सबसे ज्यादा मांग है। इस पेंटिंग को बनाने के सफर में धीरज कपूर के साथ उनकी पत्नी सोना पाधा भी बराबर योगदान दे रही हैं। वह भी एक बेहतर चित्रकार हैं। करीब 20 वर्ष की आयु में उन्होंने इस चित्रकला को सीखना प्रारंभ किया। 1981 में हस्तशिल्प विभाग के बसोहली पेंटिंग स्कूल में चित्रकला प्रशिक्षक के तौर पर काम किया। इसके बाद बसोहली चित्रकला की बारीकियों को सीखते हुए आगे बढ़े। इन दोनों की बनाई हुई पेंटिंग विदेशों में भी लोगों को काफी पसंद आ रही हैं।
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कार्यशाला में भाग लेने वाले बसोहली निवासी धीरज कपूर ने बताया कि स्कूल की किताबों से चित्र देखकर कागजों पर उकेरना शुरू किया था। 12 वर्ष की आयु में पेंटिंग सीखने की शुरुआत की थी, जिसके बाद बसोहली चित्रकला को देखकर घर आकर उसकी प्रैक्टिस करने लगे और चित्रों को कागजों पर उकेरने लगे। धीरे-धीरे पेंटिंग की सभी कलाओं के बारे में जाना। 1995 में इस कला की बारीकियां सीखने के लिए अपने गुरु पदमश्री विजय शर्मा के साथ चले गए और उनसे बारीकियां सीखी। चित्रकला अब रोजगार का साधन भी बन गया है। एक माह में करीब 60 पेंटिंग बना देते हैं, जिससे करीब 50,000 की आमदनी हो जाती है। आगे उन्होंने बताया कि होटलों में पेंटिंग की ज्यादा मांग है। मुंबई, पुणे, लखनऊ और विदेशों में बसोहली चित्रकला के नायाब चित्रों की सबसे ज्यादा मांग है। इस पेंटिंग को बनाने के सफर में धीरज कपूर के साथ उनकी पत्नी सोना पाधा भी बराबर योगदान दे रही हैं। वह भी एक बेहतर चित्रकार हैं। करीब 20 वर्ष की आयु में उन्होंने इस चित्रकला को सीखना प्रारंभ किया। 1981 में हस्तशिल्प विभाग के बसोहली पेंटिंग स्कूल में चित्रकला प्रशिक्षक के तौर पर काम किया। इसके बाद बसोहली चित्रकला की बारीकियों को सीखते हुए आगे बढ़े। इन दोनों की बनाई हुई पेंटिंग विदेशों में भी लोगों को काफी पसंद आ रही हैं।
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