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बसोहली पेंटिंग के पुराने वैभव को जीवंत करने में जुटे कलाकार
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बसोहली में आयोजित पेंटिंग वर्कशाप में भाग लेते युवा चित्रकार। संवाद
- फोटो : KATHUA
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बसोहली। ऐतिहासिक बसोहली चित्रकला को बढ़ावा देने और जीवंत रखने के उद्देश्य से कई कलाकार इस समय कस्बे के रामलीला मैदान में जुटे हैं। विश्वस्थली संस्था के 14 से 23 नवंबर तक चलने बाले चित्रकला शिविर में इन दिनों गीता गोविंदा पेंटिंग पर काम किया जा रहा है। इस चित्रकला शिविर में करीब 26 कलाकार व चित्रकला प्रेमी व विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। प्रत्येक चित्रकार गीता गोविंदा पर दो पेंटिंग बनाकर देगा, जिन्हें बसोहली पेंटिंग संग्रहालय में रखा जाएगा।
विश्वस्थली संस्था के प्रधान जगदीश ब्रहमी ने बताया कि वर्ष में दो बार पंजाब, चंबा, हिमाचल, कांगडा व अन्य स्थानों से आए चित्रकार चित्रकला शिविर में भाग लेते हैं। धीरे-धीरे बसोहली पेंटिग सेंटर एक अच्छा संग्रहालय बन जाएगा, जो पर्यटकों को आकर्षित करेगा। इस काम में न केवल राज्य, बल्कि हिमाचल के चित्रकार भी अपना योगदान दे रहे हैं। इन कलाकारों ने बसोहली चित्रकला ने किस तरह उड़ान भरी, इस बारे में विस्तार से अपनी बात रखी। चंबा के कलाकार भुवनेश्वर शर्मा ने कहा कि बसोहली पेंटिग के पुराने वैभव को जीवंत करने की कोशिश की है। विश्वस्थली संस्था ने अपनी एक गैलरी बनाई है, जिसमें वह अपना स्कूल चला रही है। यहां छात्र पेंटिंग सीख रहे हैं। बसोहली पेंटिग के अच्छे उदाहरण और नमूने जो विदेशों में हैं, उसकी अच्छी कापी बनाकर पेंटिग गैलरी में प्रदर्शित की जा सकती है। यह पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहेगी। बसोहली में एक ऐसी आर्ट गैलरी की जरूरत है, जहां पुराने समय की बसोहली कला देखने को मिल जाए। इसी दिशा में विश्वस्थली संस्था काम कर रही है और हिमाचल, चंबा के चित्रकार भी उनके साथ सहयोग कर रहे हैं।
चंबा के कलाकार पद्मश्री विजय शर्मा ने कहा कि 16 वर्ष की आयु से पेंटिग से लगाव हो गया था। राजाओं के समय की पेंटिंग को चंबा के म्यूजियम में देखते थे। प्राचीन कला को जीवंत करने की कोशिश जारी रखी। राजस्थान और बनारस में पेंटिंग के गुर सीखने के बाद पेंटिंग बनाने का सफर शुरू हुआ। चंबा में चंबा रुमाल पेंटिंग और मूर्तिकला धातु जैसी कलाएं आज भी जीवंत है। इस पर आज भी चंबा के कलाकार काम कर रहे हैं। आज कलाकारों द्वारा बनाई गई पेंटिंग आर्ट गैलरी में तो देखी जा सकती है, लेकिन राजाओं के समय में कलाकारों का जो मान-सम्मान था, वह आज के समय में खत्म हो चुका है। कांगड़ा के चित्रकार धनीराम ने बताया कि पिछले दस से बीस वर्षों में बहुत सी पहाड़ी चित्रकला पर किताबें प्रकाशित हुई हैं। देश-विदेशों में प्रदर्शनी के दौरान चित्रकला की काफी प्रसिद्धि हुई है। चित्रकला के कद्रदान भी बढ़े हैं। इससे यह उम्मीद बंधी है कि भविष्य में भी यह कला जीवंत रहेगी। इस क्षेत्र में युवक और युवतियां अपना भविष्य बना सकती हैं।
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विश्वस्थली संस्था के प्रधान जगदीश ब्रहमी ने बताया कि वर्ष में दो बार पंजाब, चंबा, हिमाचल, कांगडा व अन्य स्थानों से आए चित्रकार चित्रकला शिविर में भाग लेते हैं। धीरे-धीरे बसोहली पेंटिग सेंटर एक अच्छा संग्रहालय बन जाएगा, जो पर्यटकों को आकर्षित करेगा। इस काम में न केवल राज्य, बल्कि हिमाचल के चित्रकार भी अपना योगदान दे रहे हैं। इन कलाकारों ने बसोहली चित्रकला ने किस तरह उड़ान भरी, इस बारे में विस्तार से अपनी बात रखी। चंबा के कलाकार भुवनेश्वर शर्मा ने कहा कि बसोहली पेंटिग के पुराने वैभव को जीवंत करने की कोशिश की है। विश्वस्थली संस्था ने अपनी एक गैलरी बनाई है, जिसमें वह अपना स्कूल चला रही है। यहां छात्र पेंटिंग सीख रहे हैं। बसोहली पेंटिग के अच्छे उदाहरण और नमूने जो विदेशों में हैं, उसकी अच्छी कापी बनाकर पेंटिग गैलरी में प्रदर्शित की जा सकती है। यह पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहेगी। बसोहली में एक ऐसी आर्ट गैलरी की जरूरत है, जहां पुराने समय की बसोहली कला देखने को मिल जाए। इसी दिशा में विश्वस्थली संस्था काम कर रही है और हिमाचल, चंबा के चित्रकार भी उनके साथ सहयोग कर रहे हैं।
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चंबा के कलाकार पद्मश्री विजय शर्मा ने कहा कि 16 वर्ष की आयु से पेंटिग से लगाव हो गया था। राजाओं के समय की पेंटिंग को चंबा के म्यूजियम में देखते थे। प्राचीन कला को जीवंत करने की कोशिश जारी रखी। राजस्थान और बनारस में पेंटिंग के गुर सीखने के बाद पेंटिंग बनाने का सफर शुरू हुआ। चंबा में चंबा रुमाल पेंटिंग और मूर्तिकला धातु जैसी कलाएं आज भी जीवंत है। इस पर आज भी चंबा के कलाकार काम कर रहे हैं। आज कलाकारों द्वारा बनाई गई पेंटिंग आर्ट गैलरी में तो देखी जा सकती है, लेकिन राजाओं के समय में कलाकारों का जो मान-सम्मान था, वह आज के समय में खत्म हो चुका है। कांगड़ा के चित्रकार धनीराम ने बताया कि पिछले दस से बीस वर्षों में बहुत सी पहाड़ी चित्रकला पर किताबें प्रकाशित हुई हैं। देश-विदेशों में प्रदर्शनी के दौरान चित्रकला की काफी प्रसिद्धि हुई है। चित्रकला के कद्रदान भी बढ़े हैं। इससे यह उम्मीद बंधी है कि भविष्य में भी यह कला जीवंत रहेगी। इस क्षेत्र में युवक और युवतियां अपना भविष्य बना सकती हैं।
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